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Sneh Jain

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  1. आदि तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर तक आध्यात्मिक दिगम्बर जिन परम्परा निरन्तर चली आयी है। तीर्थंकर महावीर के समय प्राकृत भाषा भारतीय परिवार की एक सुसमृद्ध लोकभाषा रही और उसी लोकभाषा प्राकृत में तीर्थंकर महावीर ने अपना उपदेश दिया। तीर्थंकर महावीर के शिष्य गणधरों द्वारा रचित आचारांग, सूत्रकृतांग आदि बारह मूल आगम ग्रंथ काल के प्रभाव से लुप्त हो गये। तीर्थंकर महावीर के निर्वाण के 200-300 सौ वर्षों के बाद सम्राट चन्द्रगुप्त के राज्यकाल में मगध में 12 वर्ष तक भीषण अकाल पडने के परिणामस्वरूप जैन मत में दो सम्प्रदाय हुए 1.दिगम्बर 2.श्वेताम्बर | तीर्थंकर महावीर की दिगम्बर परम्परा में आगे आचार्य गुणधर से लेकर आचार्य भूतबलि, आचार्य पुष्पदन्त, आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य यतिवृषभ, आचार्य वट्टेकर, आचार्य शिवार्य आदि अनेक आचार्य हुए। इन सभी आचार्यों ने अपने ग्रंथों की रचना प्राकृत में की जो शौरसेनी प्राकृत के नाम से जानी गई। इस शौरसेनी प्राकृत से ही आगे चलकर अपभ्रंश भाषा विकसित हुई। दिगम्बर परम्परा के आचार्य योगीन्दु, मुनि रामसिंहं, आचार्य देचसेन, मुनि कनकामर, मुनि नयंनंदी आदि ने अपभ्रंश भाषा में ग्रंथ रचना की। आचार्य जिनसेन, आचार्य उमास्वामी, आचार्य गुणभद्र, आचार्य रविषेण आदि ने संस्कृत भाषा में ग्रंथ रचना की। यदि हम आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों को सही रूप में समझकर अपनी आदर्श प्राचीन परम्परा से जुडना चाहते हैं तो हमें तत्कालीन प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तथा संस्कृत भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। इन भाषाओं का ज्ञान होने पर ही हम आचार्य द्वारा कथित बात को आसानी से और सही रूप में समझ सकेंगे तथा अपनी आदर्श परम्परा से जुडकर प्रसन्न रहेंगे। सर्वप्रथम हम अपभ्रंश भाषा को सीखें और उसके बाद अपभ्रंश भाषा के आद्य अध्यात्म ग्रंथ परमात्मप्रकाश तथा अपभ्रंश के महत्वपूर्ण चरिउकाव्यों तथा मुक्तक काव्यों का भाषा के साथ अध्ययन करें। इससे हम अपभ्रंश युगीन जीवन मूल्यों को जान सकेंगे। अपभ्रंश भाषा व साहित्य के अध्ययन के बाद हम प्राकृत भाषा को सीखकर आचार्य कुन्द कुन्द देव के समग्र साहित्य का अध्ययन प्राकृत भाषा के आधार से करेंगे। इससे हम आचार्य कुन्दकुन्द युगीन जीवनमूल्यों से परिचित हो सकेंगे। तभी हम यह अनुभव कर पायेंगे कि आज हम कहीं आत्म प्रदर्शन से अपने आत्मा के मूल स्वभाव से दूर तो नहीं चले गये हैं तथा ठीक उसी प्रकार धर्म के अति प्रदर्शन से हम अपने मूल धर्म से दूर तो नहीं हो रहे हैं और यही तो हमारे अनवरत दुःखों का कारण तो नहीं है। यह सब जानने के लिए हम सर्वप्रथम भारतीय भाषाओं के मध्य प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा का क्या स्थान है इसे संक्षेप में समझते हैं और उसके बाद अपभ्रंश को सीखने का प्रयास करते हैं। अपभ्रंश को सीखने के बाद प्राकृत भाषा का अध्ययन करेंगे। अपभ्रंश भाषा सीखने के बाद प्राकृत भाषा को सीखना बहुत आसान होगा। तो सर्व प्रथम हम देखते हैं भारतीय भाषाओं में प्राकृत एवं अपभ्रंश का स्थान । पाठ - 1 भारतीय भाषाओं में प्राकृत संस्कृत एवं अपभ्रंश का स्थान प्रत्येक युग में साहित्य व बोलचाल की स्वाभाविक भाषा सदैव साथ चलती आई है। यही बोलचाल की भाषा उस साहित्यिक भाषा को नया जीवन प्रदान कर सदैव विकसित होती चली है। भारतदेश की भाषा के विकास को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। 1. प्रथम स्तर: आद्य कथ्य भाषा, छान्द्स एवं संस्कृत (ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 600 तक) - वैदिक साहित्य से पूर्व भारतदेश के अनेक प्रदेशों में बोली जाने वाली प्राकृत भाषाओं को ही भारतदेश की आद्य कथ्य भाषा माना गया है। इन प्रादेशिक भाषाओं के विविध रूपों के आधार से ही वैदिक साहित्य की रचना हुई और वैदिक साहित्य की भाषा को ‘छान्दस’ कहा गया। यह छान्द्स उस समय की साहित्यिक भाषा बन गई। पाणिनी ने अपने समय तक चली आई छान्द्स की परम्परा को व्याकरण द्वारा नियन्त्रित एवं स्थिरता प्रदान कर लौकिक संस्कृत नाम दिया। इस तरह वैदिक भाषा (छान्द्स) और लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव वैदिक काल की आद्य कथ्य प्राकृत भाषाओं से ही हुआ है, यही भारतीय भाषा के विकास का प्रथम स्तर है। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि पाणिनी द्वारा छान्द्स (वैदिक) भाषा के आधार से जिस लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव हुआ, उसमें पाणिनी के बाद कोई परिवर्तन नहीं हुआ, जबकि वैदिक युग की कथ्य रूप से प्रचलित प्रादेशिक प्राकृत भाषाओं में परवर्ती काल में अनेक परिवर्तन हुए। भारतीय भाषा के इस द्वितीय स्तर को तीन युगों में विभक्त किया गया है। 2. द्वितीय स्तरः प्राकृत साहित्य (ईसापूर्व 600 से ईसवी 200 तक) - प्रथमयुगः- (ई.पूर्व 600से इ्र्र. 200 तक) इसमें तीर्थंकर महावीर के उपदेश की भाषा प्राकृत, शिलालेखी प्राकृत, धम्मपद की प्राकृत, आर्ष-पालि, प्राचीन जैन सूत्रों की प्राकृत, अश्वघोष के नाटकों की प्राकृत, बोद्ध जातकों की भाषाएँ आती हैं। मध्य युगीनः- (200 ई. से 600 ई. तक) इसमें भाष और कालिदास के नाटकों की प्राकृत, गीतिकाव्य और महाकाव्यों की प्राकृत, परवर्ती जैन काव्य साहित्य की प्राकृत, प्राकृत वैयाकरणों द्वारा निरूपित और अनुशासित प्राकृतें एवं वृहत्कथा की पैशाची प्राकृत है। तृतीय युगीनः-(600 से 1200 ई. तक) भिन्न भिन्न प्रदेशों की परवर्तीकाल की अपभ्रंश भाषाएँ। 3.तृतीय स्तरः (1200 ईस्वी से आगे तक) - पुनः अपभ्रंश भाषा के जन साधारण में अप्रचलित होने से ईस्वी की पंचम शताब्दी के पूर्व से लेकर दशम शताब्दी पर्यन्त भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों में कथ्यभाषाओं के रूप में प्रचलित जिस-जिस अपभ्रंश भाषा से भिन्न भिन्न प्रदेश की जो-जो आधुनिक आर्य कथ्य भाषा उत्पन्न हुई है उसका विवरण इस प्रकार है - मराठी-अपभ्रंश से - मराठी और कोंकणी भाषा। मागधी अपभ्रंश की पूर्व शाखा से - बंगला,उडिया और आसामी भाषा। मागधी-अपभ्रंश की बिहारी शाखा से - मैथिली,मगही,और भोजपुरिया। अर्ध मागधी-अपभ्रंश से - पूर्वीय हिन्दी भाषाएँ अर्थात अवधी,बघेली,छत्तीसगढी़। सौरसेनी अपभ्रंश से - बुन्देली,कन्नोजी,ब्रजभाषा,बाँगरू,हिन्दी । नागर अपभ्रंश से - राजस्थानी,मालवा,मेवाड़ी,जयपुरी,मारवाड़ी तथा गुजराती। पाली से - सिंहली और मालदीवन । टाक्की अथवा ढाक्की से - लहन्डी या पश्चिमीय पंजाबी । ब्राचड अपभ्रंश से - सिन्धी भाषा । पैशाची अपभ्रंश से - कश्मीरी भाषा। इस प्रकार हम देखते है कि अपभ्रंश मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा की अन्तिम अवस्था तथा प्राचीन और नवीन भारतीय आर्यभाषाओं के बीच का सेतुबन्ध है। इसका परवर्ती नव्य भारतीय आर्यभाषाओं के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है। मराठी, गुजराती,राजस्थानी, उड़िया, बंगाली,असमिया आदि सभी आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के विकास में अपभ्रंश की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिन्दी भाषा तो इसकी साक्षात उत्तराधिकारिणी है। इस प्रकार आरम्भिक जन भाषा से आधुनिक भारतीय भाषाओं के विषय में संक्षेप में जानकारी प्राप्त की।
  2. पुनः आचार्य योगीन्दु दृढ़तापूर्वक मोक्षमार्ग में प्रीति करने के लिए समझाते हैं कि यहाँ संसार में कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है, प्रत्येक वस्तु नश्वर है, फिर उनसे प्रीति किस लिए ? क्योंकि प्रिय वस्तु का वियोग दुःखदायी है और वियोग अवश्यंभावी है। जाते हुए जीव के साथ जब शरीर ही नहीं जाता तो फिर संसार की कौन सी वस्तु उसके साथ जायेगी। अतःः सांसारिक वस्तुओं से प्रीति के स्थान पर मोक्ष में प्रीति ही हितकारी है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा 129. जोइय सयलु वि कारिमउ णिक्कारिमउ ण कोइ। जीविं जंतिं कुडि ण गय इहु पडिछन्दा जोइ।। अर्थ -हे योगी! यहाँ प्रत्येक (वस्तु) कृत्रिम (नाशवान) है, कोई भी (वस्तु) अकृत्रिम (अविनाशी) नहीं है। जाते हुए जीव के साथ शरीर (कभी भी) नहीं गया, इस समानता (उदाहरण) को तू समझ। शब्दार्थ - जोइय- हे योगी, सयलु-प्रत्येक, वि-ही, कारिमउ-कृत्रिम, णिक्कारिमउ-अकृत्रिम, ण -नहीं, कोइ-कोई भी, जीविं-जीव के साथ, जंतिं -जाते हुए, कुडि-शरीर, ण-नहीं, गय-गया, इहु- इस, पडिछन्दा-समानता को, जोइ-समझ।
  3. आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि सभी प्रकार के जीवों में मनुष्य ही श्रेष्ठ जीव है। जीवन में सुख-शान्ति का मतलब जितना वह समझ सकता है उतना कोई तिर्यंच आदि जीव नहीं। किन्तु देखने को यह मिलता है कि मनुष्य ही सबसे अशान्त जीव है। आचार्य ऐसे अशान्त जीव को शान्ति का मार्ग बताते हुए कहते हैं कि तू सांसारिक सुखों में उलझकर मोक्ष मार्ग को मत छोड़। मोक्ष का तात्पर्य शब्द कोश में शान्ति, दुःखों से निवृत्ति ही मिलता है। आचार्य के अनुसार जब हमारे जीवन का ध्येय शान्ति की प्राप्ति होगा तो हम सांसारिक सुखों को सही रूप में भोगते हुए भी उनमें भटकेंगे नहीं। जब हमारा ध्येय शान्ति की प्राप्ति होगा तब तदानुरूप ही हमारी क्रिया होगी। अतः शुद्ध मोक्षमार्ग में प्रीति आवश्यक है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 128. मूढा सयलु वि कारिमउ भुल्लउ मं तुस कंडि। सिव-पहि णिम्मलि करहि रइ घरु परियणु लहु छंडि।। अर्थ - हे मूर्ख! यह समस्त जगत ही कृत्रिम है,(सांसारिक सुखों में) भटका हुआ तू भूसी को कूटकर भूसी अलग मत कर। (समय व्यर्थ बरबाद मत कर) । घर, (और) परिवार को छोड़कर शुद्ध मोक्ष मार्ग में प्रीति कर। शब्दार्थ -मूढा - हे मूर्ख, सयलु-समस्त, वि-ही, कारिमउ-कृत्रिम, भुल्लउ-भटका हुआ, मं-मत, तुस-भूसी को, कंडि-कूटकर भूसी अलग कर, सिव-पहि-मोक्ष मार्ग में, णिम्मलि-शुद्ध, करहि -कर, रइ -प्रीति, घरु -घर, परियणु-परिवार, लहु-शीघ्र, छंडि-छोड़कर।
  4. इस दोहे में आचार्य योगीन्दु स्पष्टरूप में घोषणा करते हैं कि हे प्राणी! यदि तू बेहोशी में जीकर इतना नहीं सोचेगा कि मेरे क्रियाओं से किसी को कोई पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है तो तू निश्चितरूप से नरक के समान दुःख भोगेगा। इसके विपरीत यदि तेरी प्रत्येक क्रिया इतनी जागरूकता के साथ है कि तेरी क्रिया से किसी भी प्राणी को तकलीफ नहीं पहुँचती तो तू निश्चितरूप से स्वर्ग के समान सुख प्राप्त करेगा। यह कहकर आचार्य योगीन्दु बडे़ प्रेम से कहते हैं कि देख भाई मैंने तूझे सुख व दुःख के दो मार्गों को अच्छी तरह से समझा दिया है, अब तुझे जो सही लगे वही कर। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 127. जीव वहंतहँ णरय-गइ अभय-पदाणे ँ सग्ग। बे पह जवला दरिसिया जहि ँ रुच्चइ तहि ँ लग्गु।। अर्थ - जीवों का वध करते हुओं को नरकगति (मिलती है), (तथा) अभय दान से स्वर्ग (मिलता है)। (ये) दो मार्ग समुचित रूप से (तुझकोे) बताये गये हैं, जिसमें तुझे अच्छा लगता है उसमें दृढ़ हो। शब्दार्थ - जीव-जीवों का, वहंतहँ-वध करते हुओं को, णरय-गइ-नरक गति, अभय-पदाणे ँ -अभय दान से स्वर्ग, सग्ग-स्वर्ग, बे -दो, पह -मार्ग, जवला-समुचित, दरिसिया-बताये गये हैं, जहि ँ-जिसमें, रुच्चइ -अच्छा लगता है, तहि ँ-उसमें, लग्गु-दृढ़ हो।
  5. आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि हे प्राणी! तू किसी भी क्रिया को करने से पहले उसके विषय में अच्छी तरह से विचार कर। अन्यथा भोगों के वशीभूत होकर अज्ञानपूर्वक की गयी तेरी क्रिया से जीवों को जो दुःख हुआ है उसका अनन्त गुणा दुःख तुझे प्राप्त होगा। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 126. मारिवि चूरिवि जीवडा जं तुहुँ दुक्खु करीसि । तं तह पासि अणंत-गुण अवसइँ जीव लहीसि।। अर्थ - हे जीव! तू जीवों को मारकर, कुचलकर (उनके लिए) जो दुःख उत्पन्न करता है, उस (दुःख के फल) को तू उस (दुःख) की श्रृंखला में अनन्त गुणा अवश्य ही प्राप्त करेगा। शब्दार्थ - मारिवि -मारकर, चूरिवि -कुचलकर, जीवडा -जीवों को, जं -जो, तुहुँ -तू, दुक्खु -दुख,करीसि-उत्पन्न करता है, तं - उसको, तह-उसकी, पासि-श्रृंखला में, अणंत-गुण -अनन्त गुणा, अवसइँ - अवश्य ही,जीव-हे जीव! लहीसि-प्राप्त करेगा।
  6. आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि हे प्राणी! तू किसी भी क्रिया को करने से पहले उसके विषय में अच्छी तरह से विचार कर। अन्यथा भोगों के वशीभूत होकर अज्ञानपूर्वक की गयी तेरी क्रिया से जीवों को जो दुःख हुआ है उसका अनन्त गुणा दुःख तुझे प्राप्त होगा। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 126. मारिवि चूरिवि जीवडा जं तुहुँ दुक्खु करीसि । तं तह पासि अणंत-गुण अवसइँ जीव लहीसि।। अर्थ - हे जीव! तू जीवों को मारकर, कुचलकर (उनके लिए) जो दुःख उत्पन्न करता है, उस (दुःख के फल) को तू उस (दुःख) की श्रृंखला में अनन्त गुणा अवश्य ही प्राप्त करेगा। शब्दार्थ - मारिवि -मारकर, चूरिवि -कुचलकर, जीवडा -जीवों को, जं -जो, तुहुँ -तू, दुक्खु -दुख,करीसि-उत्पन्न करता है, तं - उसको, तह-उसकी, पासि-श्रृंखला में, अणंत-गुण -अनन्त गुणा, अवसइँ - अवश्य ही,जीव-हे जीव! लहीसि-प्राप्त करेगा।
  7. आचार्य योगीन्दु की यह गाथा सार्वकालिक व सार्वभौमिक है। हम सभी गृहस्थ जीव आज पुत्र, पुत्री, पत्नी, पति के मोह में पड़कर उनके सुख के लिए कितने ही लोगों को दुःखी कर पाप अर्जित करते हैं। हम बच्चों को रागवश उनकी सभी उचित अनुचित अभिलाषा पूर्ण कर उनको प्रमादी व पराधीन बना देते हैं। इसका परिणाम हम जब भुगतते हैं जब वे हमारे रागवश बिगड़ जाते हैं और हमारी वृद्धावस्था में हमारे दुःख का कारण बनते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोग भी हमसे दूर हो जाते हैं जिनकोे हमने अपने बच्व्चो के कारण दुःख दिया। इस प्रकार पुत्र व स्त्री से अति राग अन्त में मानव को एकाकी, दयनीय व दुःखी बना देता है। इसीलिए आचार्य ने हम सभी जीवों के लिए अपने नजदीकी सम्बन्धों से भी राग करने को हेय बताया है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 125. मारिवि जीवहँ लक्खडा जं जिय पाउ करीसि। पुत्त-कलत्तहँ कारणइँ तं तुहुँ एक्कु सहीसि।। अर्थ - हे जीव! तू पुत्र और स्त्री के निमित्त से लाखों जीवों को मारकर जो पाप करता है, उस (पाप के फल) को तू अकेला सहन करेगा। शब्दार्थ -मारिवि-मारकर, जीवहँ -जीवों को, लक्खडा -लाखों, जं-जो, जिय-हे जीव! पाउ -पाप, करीसि-करता है, पुत्त-कलत्तहँ-पुत्र और स्त्री के, कारणइँ -निमित्त से, तं -उसको, तुहुँ -तू, एक्कु -अकेला, सहीसि-सहन करेगा।
  8. आचार्य योगीन्दु की यह गाथा सार्वकालिक व सार्वभौमिक है। हम सभी गृहस्थ जीव आज पुत्र, पुत्री, पत्नी, पति के मोह में पड़कर उनके सुख के लिए कितने ही लोगों को दुःखी कर पाप अर्जित करते हैं। हम बच्चों को रागवश उनकी सभी उचित अनुचित अभिलाषा पूर्ण कर उनको प्रमादी व पराधीन बना देते हैं। इसका परिणाम हम जब भुगतते हैं जब वे हमारे रागवश बिगड़ जाते हैं और हमारी वृद्धावस्था में हमारे दुःख का कारण बनते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोग भी हमसे दूर हो जाते हैं जिनकोे हमने अपने बच्व्चो के कारण दुःख दिया। इस प्रकार पुत्र व स्त्री से अति राग अन्त में मानव को एकाकी, दयनीय व दुःखी बना देता है। इसीलिए आचार्य ने हम सभी जीवों के लिए अपने नजदीकी सम्बन्धों से भी राग करने को हेय बताया है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 125. मारिवि जीवहँ लक्खडा जं जिय पाउ करीसि। पुत्त-कलत्तहँ कारणइँ तं तुहुँ एक्कु सहीसि।। अर्थ - हे जीव! तू पुत्र और स्त्री के निमित्त से लाखों जीवों को मारकर जो पाप करता है, उस (पाप के फल) को तू अकेला सहन करेगा। शब्दार्थ -मारिवि-मारकर, जीवहँ -जीवों को, लक्खडा -लाखों, जं-जो, जिय-हे जीव! पाउ -पाप, करीसि-करता है, पुत्त-कलत्तहँ-पुत्र और स्त्री के, कारणइँ -निमित्त से, तं -उसको, तुहुँ -तू, एक्कु -अकेला, सहीसि-सहन करेगा।
  9. आचार्य योगीन्दु ने अपनी अथक साधना से जीवन की शान्ति के मार्ग का अनुसंधान किया है। उस ही अनुसंधान के आधार पर वे स्पष्टरूप से कहते हैं कि जीवन में शान्ति का मार्ग मात्र आत्म चिंतन ही है। आत्मा का ध्यान करने वाले को सभी की आत्मा समान जान पडती है जिससे उसके द्वारा की गया प्रत्येक क्रिया स्व और पर के लिए हितकारी होती है। इसी से उसका जीवन शान्तिमय होता है। अतः घर-परिवार की चिन्ता करने से शान्ति नहीं अपितु आत्मा का चिंतन करने से ही शान्ति प्राप्त हो सकती है।देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 124. मुक्खु ण पावहि जीव तुहुँ घरु परियणु चिंतंतु। तो वरि चिंतहि तउ जि तउ पावहि मोक्ख महंतु।। अर्थ - हे जीव! तू घर और परिवार की चिंता करता हुआ शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिए अच्छा है कि तू उस ही उस आत्मा का चिंतन कर, (जिससे) श्रेष्ठ शान्ति को प्राप्त कर सके। शब्दार्थ - मुक्खु-शान्ति, ण-नहीं, पावहि-प्राप्त कर सकता है, जीव-हे जीव!, तुहुँ- तू, घरु -घर,परियणु - परिवार की, चिंतंतु-चिन्ता करता हुआ, तो-इसीलिए, वरि-अच्छा है, चिंतहि-चिन्तन कर, तउ-उस, जि-ही, तउ -उसका, पावहि-प्राप्ति कर सके, मोक्ख-शान्ति, महंतु-श्रेष्ठ।
  10. आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि हे जीव! तू मात्र अपनी आत्मा को ही अपनी मान। उसके अतिरिक्त घर, परिवार, शरीर और अपने प्रियजन पर हैं। योगियों के द्वारा आगम में इन सबको कर्मों के वशीभूत और कृत्रिम माना गया है। आत्मा पर श्रृद्वान होने से ही व्यक्ति स्व का कल्याण कर पर कल्याण के योग्य बनता है। जब वह अपनी आत्मा पर श्रृद्वान करता है तो उसे पर की आत्मा भी स्वयं के समान प्रतीत होती है। इसीलिए आचार्य योगीन्दु ने आत्मा पर श्रृ़द्वान करने के लिए कहा है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 123. जीव म जाणहि अप्पणउँ घरु परियणु तणु इट्ठु। कम्मायत्तउ कारिमउ आगमि जोइहि ँँ दिट्ठु।। अर्थ - हे जीव! तू घर, परिवार, शरीर (और) प्रिय (लगनेवाले) को अपना मत जान। योगियों के द्वारा आगम में (इनमें से प्रत्येक ) कर्मों के वशीभूत और कृत्रिम माना गया है। शब्दार्थ - जीव - हे जीव! म -मत, जाणहि -जान, अप्पणउँ-अपना, घरु -घर, परियणु-परिवार, तणु -शरीर, इट्ठु-प्रिय, कम्मायत्तउ-कर्मों के वशीभूत, कारिमउ-कृत्रिम, आगमि-आगम में, जोइहि ँँ-योगियों के द्वारा, दिट्ठुःमाना गया है। (ठोलिया साहब के अस्वस्थ होने के कारण लम्बा व्यवधान रहा। आगे उसी क्रम में आगे चलते हैं)
  11. आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि चाहे यह लोक हो या परलोक, दुःख का कारण मात्र अपना अज्ञान ही है जिसके कारण हम पति, सन्तान व स्त्रियों से मोह कर दुःख उठाते है। यदि हम अपने ज्ञान से अपना मोह समाप्त कर लेंगे तो हमारा वर्तमान जीवन तो शान्त होगा ही और यही हमारी शान्त दशा हमें परलोक में ले जायेगी। मोक्ष का अर्थ भी शान्ति ही तो है। अतः शान्ति के इच्छुक भव्य जनों को अपने ज्ञान से मोह को नष्ट करना चाहिए। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 122. जोणिहि लक्खहि परिभमइ अप्पा दुक्खु सहंतु। पुत्त-कलत्तहिँ मोहियउ जाव ण णाणु महंतु।। अर्थ -जब तक उत्तम ज्ञान नहीं है, पुत्र और स्त्रियों के द्वारा मोहित किया हुआ जीव, दुःख सहन करता हुआ लाखों योनियों में परिभ्रमण करता है। शब्दार्थ - जोणिहि-योनियों में, लक्खहि-लाखों, परिभमइ-परिभ्रमण करता है, अप्पा-आत्मा, दुक्खु-दुःख सहंतु-सहन करता हुआ, पुत्त-कलत्तहिँ -पुत्र और स्त्रियों के द्वारा,मोहियउ-मोहित किया हुआ, जाव-जब तक, ण-नहीं, णाणु-ज्ञान, महंतु-उत्तम।
  12. आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि हम सब अज्ञानी जीव भोगों में फँसकर दिन रात अपने-अपने व्यापार में लगे हुए हैं । हमारे पास आत्मा के चिंतन के लिए जरा सा भी समय नहीं है, जो कि शान्ति का सबसे बड़ा साधन है। यही कारण है कि आज सारा जगत अपने इन ही कारणों से अशान्त है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 121. धंधइ पडियउ सयलु जगु कम्मइँ करइ अयाणु। मोक्खहँ कारणु एक्कुु खणु णवि चिंतइ अप्पाणु।। अर्थ -धंधे में फँसा हुआ समस्त अज्ञानी जगत (ज्ञानावरणादि आठों) कर्मों को करता है,(किन्त)ु मोक्ष का हेतु अपनी आत्मा का चिंतन एक क्षण भी नहीं करता है। शब्दार्थ -धंधइ-धंधे में, पडियउ-फँसा हुआ, सयलु - समस्त, जगु-जग, कम्मइँ-कर्मों को, करइ-करता है, अयाणु-अज्ञानी, मोक्खहँ -मोक्ष का, कारणु -हेतु, एक्कुु-एक, खणु-क्षण, णवि-भी, नहीं, चिंतइ-चिंतन करता है, अप्पाणु-आत्मा का।
  13. आचार्य योगीन्दु अपने साधर्मी मुनिराज को समझाते हैं कि हे योग का निरोध करनेवाले जीव, जब तूने संसार के भय से घबराकर शान्ति हेतु मोक्ष मार्ग अपनाया है तो फिर तू पुनः संसार भ्रमण के कर्मों को क्यों करता है ? देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 120. जिय अणु-मित्तु वि दुक्खडा सहण ण सक्कहि जोइ। चउ-गइ-दुक्खहँ कारणइँ कम्मइँ कुणहि किं तोइ।। अर्थ - 120. हे योग का निरोध करनेवाले जीव! तू अणुमात्र भी दुःख सहन करने के लिए समर्थ नहीं होता है, तो फिर तू चारों गतियों के दुःखों के हेतु कर्मों को क्यों करता है ? शब्दार्थ - जिय-हे जीव, अणु-मित्तु - अणु मात्र, ,वि-भी, दुक्खडा-दुःख, सहण-सहन करने के लिए, ण-नहीं, सक्कहि-समर्थ होता है, जोइ-हे योग का निरोध करनेवाले, चउ-गइ-दुक्खहँ-चारों गतियों के दुःखों के, कारणइँ-हेतु, कम्मइँ-कर्मों को, कुणहि-करता है, किं -क्यों, तो -फिर, इ-पादपूर्ति हेतु प्रयुक्त अव्यय।
  14. आचार्य योगीन्दु अपने साधर्मी साधु को समझाते हैं कि तू संसार में भ्रमण करता हुआ बहुत दुःख प्राप्त कर रहा है। अतः अब शीघ्र अपने आठों ही कर्मों को नष्ट कर, जिससे मोक्ष को प्राप्त हो सके। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 119. पावहि दुक्खु महंतु तुहुँ जिय संसारि भमंतु। अट्ठ वि कम्मइँ णिद्दलिवि वच्चहि मुक्खु महंतु।। अर्थ -. हे जीव! तू संसार में भ्रमण करता हुआ बहुत दुःख प्राप्त करता है। (अतः) आठों ही कर्मों को नष्ट कर श्रेष्ठ (स्थान) मोक्ष जा। शब्दार्थ -पावहि-प्राप्त करता है, दुक्खु-दुःख, महंतु-बहुत, तुहुँ-तू, जिय-हे जीव!, संसारि-संसार में, भमंतु-भ्रमण करता हुआ, अट्ठ-आठों, वि-ही, कम्मइँ-कर्मों को, णिद्दलिवि-नष्ट कर, वच्चहि-जा, मुक्खु-मोक्ष, महंतु-श्रेष्ठ।
  15. आचार्य योगीन्दु अपने साधर्मी उन साधुजनों को समझा रहे हैं जो साधु मार्ग का अनुकरण कर कठोर चर्या का पालन करके भी अनेक प्रकार की आसक्तियों में पड़कर आत्म हित नहीं कर रहे हैं। वे कहते हैं जिन राज सुखों को पाने के लिए लोग अपनी जान लगा देते हैं, उन राज्य सुखों का जिनवरों ने आसानी से त्याग कर मोक्ष प्राप्ति के द्वारा आत्म हित कर लिया। किन्तु हे मूर्ख साधु तुझे तो किसी प्रकार का राज सुख भी नहीं त्यागना पड़ा, फिर भी तू आत्म हित में तत्पर नहीं है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 118. मोक्खु जि साहिउ जिणवरहि ँ छंडिवि बहु-विहु रज्जु। भिक्ख-भरोडा जीव तुहुँ करहि ण अप्पउ कज्जु।। अर्थ -जिनदेवों के द्वारा अनेक प्रकार का राज्य वैभव छोड़कर मोक्ष ही सिद्ध किया गया है। हे भिक्षा पर आश्रित पूजनीय जीव! तू आत्मा का करने योग्य कार्य (आत्म हित) (भी) नहीं करता है। शब्दार्थ - मोक्खु-मोक्ष, जि-ही, साहिउ-सिद्ध किया गया है, जिणवरहि ँ -जिनदेवों के द्वारा, छंडिवि- छोड़कर, बहु-विहु रज्जु- अनेक प्रकार का राज्य वैभव, भिक्ख-भरोडा -हे भिक्षा पर आश्रित पूजनीय, जीव -जीव, तुहुँ-तू, करहि-करता है, ण-नहीं, अप्पउ-आत्मा का, कज्जु-करने योग्य कार्य।
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