Jump to content
JainSamaj.World
Sign in to follow this  
Sneh Jain

पाठ - 1 आदर्श प्राचीन परम्परा

Recommended Posts

आदि तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर तक आध्यात्मिक दिगम्बर जिन परम्परा निरन्तर चली आयी है। तीर्थंकर महावीर के समय प्राकृत भाषा भारतीय परिवार की एक सुसमृद्ध लोकभाषा रही और उसी  लोकभाषा प्राकृत में तीर्थंकर महावीर ने अपना उपदेश दिया। तीर्थंकर महावीर के शिष्य गणधरों द्वारा रचित आचारांग, सूत्रकृतांग आदि बारह मूल आगम ग्रंथ  काल के प्रभाव से लुप्त हो गये। तीर्थंकर महावीर के निर्वाण के 200-300 सौ वर्षों के बाद सम्राट चन्द्रगुप्त के राज्यकाल में मगध में 12 वर्ष तक भीषण अकाल पडने के परिणामस्वरूप जैन मत में दो सम्प्रदाय हुए 1.दिगम्बर 2.श्वेताम्बर | तीर्थंकर महावीर की दिगम्बर परम्परा में आगे आचार्य गुणधर से लेकर आचार्य भूतबलि, आचार्य पुष्पदन्त, आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य यतिवृषभ, आचार्य वट्टेकर, आचार्य शिवार्य आदि अनेक आचार्य हुए। इन सभी आचार्यों ने अपने ग्रंथों की रचना प्राकृत में की जो शौरसेनी प्राकृत के नाम से जानी गई।  इस शौरसेनी प्राकृत से ही आगे चलकर अपभ्रंश भाषा विकसित हुई। दिगम्बर परम्परा के आचार्य योगीन्दु, मुनि रामसिंहं, आचार्य देचसेन, मुनि कनकामर, मुनि नयंनंदी आदि ने अपभ्रंश भाषा में ग्रंथ रचना की। आचार्य जिनसेन, आचार्य उमास्वामी, आचार्य गुणभद्र, आचार्य रविषेण आदि ने संस्कृत भाषा में ग्रंथ रचना की। 

यदि हम आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों को सही रूप में समझकर अपनी आदर्श प्राचीन परम्परा से जुडना चाहते हैं तो हमें तत्कालीन प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तथा संस्कृत भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। इन भाषाओं  का ज्ञान होने पर ही हम आचार्य द्वारा कथित बात को आसानी से और सही रूप में समझ सकेंगे तथा अपनी आदर्श परम्परा से जुडकर प्रसन्न रहेंगे। 

सर्वप्रथम हम अपभ्रंश भाषा को सीखें और उसके बाद अपभ्रंश भाषा के आद्य अध्यात्म ग्रंथ परमात्मप्रकाश तथा अपभ्रंश के महत्वपूर्ण चरिउकाव्यों तथा मुक्तक काव्यों का भाषा के साथ अध्ययन करें। इससे हम अपभ्रंश युगीन जीवन मूल्यों को जान सकेंगे। अपभ्रंश भाषा व साहित्य के अध्ययन के बाद हम प्राकृत भाषा को सीखकर आचार्य कुन्द कुन्द देव के समग्र साहित्य का अध्ययन प्राकृत भाषा के आधार से करेंगे। इससे हम आचार्य कुन्दकुन्द युगीन जीवनमूल्यों से परिचित हो सकेंगे। तभी हम यह अनुभव कर पायेंगे कि आज हम कहीं आत्म प्रदर्शन से अपने आत्मा के मूल स्वभाव से दूर तो नहीं चले गये हैं तथा ठीक उसी प्रकार धर्म के अति प्रदर्शन से हम अपने मूल धर्म से दूर तो नहीं हो रहे हैं और यही तो हमारे अनवरत दुःखों का कारण तो नहीं है। 


यह सब जानने के लिए हम सर्वप्रथम भारतीय भाषाओं के मध्य प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा का क्या स्थान है इसे संक्षेप में समझते हैं और उसके बाद अपभ्रंश को सीखने का प्रयास करते हैं। अपभ्रंश को सीखने के बाद प्राकृत भाषा का अध्ययन करेंगे। अपभ्रंश भाषा सीखने के बाद प्राकृत भाषा को सीखना बहुत आसान होगा।  तो सर्व प्रथम हम देखते हैं भारतीय भाषाओं में प्राकृत एवं अपभ्रंश का स्थान । 

 

पाठ - 1 भारतीय भाषाओं में प्राकृत संस्कृत एवं अपभ्रंश का स्थान

प्रत्येक युग में साहित्य व बोलचाल की स्वाभाविक भाषा सदैव साथ चलती आई है। यही बोलचाल की भाषा उस साहित्यिक भाषा को नया जीवन प्रदान कर सदैव विकसित होती चली है। भारतदेश की भाषा के विकास को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। 

1. प्रथम स्तर: आद्य कथ्य भाषा, छान्द्स एवं संस्कृत (ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 600 तक) - वैदिक साहित्य से पूर्व भारतदेश के अनेक प्रदेशों में बोली जाने वाली प्राकृत भाषाओं को ही भारतदेश की आद्य कथ्य भाषा माना गया है। इन प्रादेशिक भाषाओं के विविध रूपों के आधार से ही वैदिक साहित्य की रचना हुई और वैदिक साहित्य की भाषा को ‘छान्दस’ कहा गया। यह छान्द्स उस समय की साहित्यिक भाषा बन गई। पाणिनी ने अपने समय तक चली आई छान्द्स की परम्परा को व्याकरण द्वारा नियन्त्रित एवं स्थिरता प्रदान कर लौकिक संस्कृत नाम दिया। इस तरह वैदिक भाषा (छान्द्स) और लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव वैदिक काल की आद्य कथ्य प्राकृत भाषाओं से ही हुआ है, यही भारतीय भाषा के विकास का प्रथम स्तर है। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि पाणिनी द्वारा छान्द्स (वैदिक) भाषा के आधार से जिस लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव हुआ, उसमें पाणिनी के बाद कोई परिवर्तन नहीं हुआ, जबकि वैदिक युग की कथ्य रूप से प्रचलित प्रादेशिक प्राकृत भाषाओं में परवर्ती काल में अनेक परिवर्तन हुए। भारतीय भाषा के इस द्वितीय स्तर को तीन युगों में विभक्त किया गया है।


2. द्वितीय स्तरः  प्राकृत साहित्य  (ईसापूर्व 600 से ईसवी 200 तक) - 

प्रथमयुगः- (ई.पूर्व 600से इ्र्र. 200 तक) इसमें तीर्थंकर महावीर के उपदेश की भाषा प्राकृत, शिलालेखी प्राकृत, धम्मपद की प्राकृत, आर्ष-पालि, प्राचीन जैन सूत्रों की प्राकृत, अश्वघोष के नाटकों की प्राकृत, बोद्ध जातकों की भाषाएँ आती हैं।

मध्य युगीनः- (200 ई. से 600 ई. तक) इसमें भाष और कालिदास के नाटकों की प्राकृत, गीतिकाव्य और महाकाव्यों की प्राकृत, परवर्ती जैन काव्य साहित्य की प्राकृत, प्राकृत वैयाकरणों द्वारा निरूपित और अनुशासित प्राकृतें एवं वृहत्कथा की पैशाची प्राकृत है।

तृतीय युगीनः-(600 से 1200 ई. तक) भिन्न भिन्न प्रदेशों की परवर्तीकाल की अपभ्रंश भाषाएँ।


3.तृतीय स्तरः (1200 ईस्वी से आगे तक) - पुनः अपभ्रंश भाषा के जन साधारण में अप्रचलित होने से ईस्वी की पंचम शताब्दी के पूर्व से लेकर दशम शताब्दी पर्यन्त भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों में कथ्यभाषाओं के रूप में प्रचलित जिस-जिस अपभ्रंश भाषा से भिन्न भिन्न प्रदेश की जो-जो आधुनिक आर्य कथ्य भाषा उत्पन्न हुई है उसका विवरण इस प्रकार है -
मराठी-अपभ्रंश से - मराठी और कोंकणी भाषा।
मागधी अपभ्रंश की पूर्व शाखा से - बंगला,उडिया और आसामी भाषा।
मागधी-अपभ्रंश की बिहारी शाखा से - मैथिली,मगही,और भोजपुरिया।
अर्ध मागधी-अपभ्रंश से - पूर्वीय हिन्दी भाषाएँ अर्थात अवधी,बघेली,छत्तीसगढी़।
सौरसेनी अपभ्रंश से - बुन्देली,कन्नोजी,ब्रजभाषा,बाँगरू,हिन्दी ।
नागर अपभ्रंश से - राजस्थानी,मालवा,मेवाड़ी,जयपुरी,मारवाड़ी तथा गुजराती। 
पाली से - सिंहली और मालदीवन ।
टाक्की अथवा ढाक्की से - लहन्डी या पश्चिमीय पंजाबी ।
ब्राचड अपभ्रंश से - सिन्धी भाषा ।
पैशाची अपभ्रंश से - कश्मीरी भाषा।

इस प्रकार हम देखते है कि अपभ्रंश मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा की अन्तिम अवस्था तथा प्राचीन और नवीन भारतीय आर्यभाषाओं के बीच का सेतुबन्ध है। इसका परवर्ती नव्य भारतीय आर्यभाषाओं के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है। मराठी, गुजराती,राजस्थानी, उड़िया, बंगाली,असमिया आदि सभी आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के विकास में अपभ्रंश की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिन्दी भाषा तो इसकी साक्षात उत्तराधिकारिणी है। इस प्रकार आरम्भिक जन भाषा से आधुनिक भारतीय भाषाओं के विषय में संक्षेप में जानकारी प्राप्त की।

Edited by Sneh Jain

Share this post


Link to post
Share on other sites
Sign in to follow this  

×