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    English translation by Vijay K. Jain; Edited by Vijay K. Jain; Blessings (Foreword) by His Holiness Ācārya 108 Vidyānanda Muni Ācārya Kundakunda’s (circa 1st century BCE) Pravacanasāra (also written as Pravacanasara or Pravachanasara) is among the most popular Jaina Scriptures that are studied with great reverence by the ascetics as well as the laymen. Consciousness manifests in form of cognition (upayoga) – pure-cognition (śuddhopayoga), auspicious-cognition (śubhopayoga) and inauspicious-cognition (aśubhopayoga). Pure-cognition represents conduct without-attachment (vītarāga cāritra). Perfect knowledge or omniscience (kevalajñāna) is the fruit of pure-cognition (śuddhopayoga). The soul engaged in pure-cognition (śuddhopayoga) enjoys supreme happiness engendered by the soul itself; this happiness is beyond the five senses – atīndriya – unparalleled, infinite, and imperishable. Omniscience (kevalajñāna) is real happiness; there is no difference between knowledge and happiness. Delusion (moha), the contrary and ignorant view of the soul about substances, is the cause of misery. The soul with attachment (rāga) toward the external objects makes bonds with karmas and the soul without attachment toward the external objects frees itself from the bonds of karmas. The stainless soul knows the reality of substances, renounces external and internal attachments (parigraha) and does not indulge in the objects-of-the-senses.
  4. आदि तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर तक आध्यात्मिक दिगम्बर जिन परम्परा निरन्तर चली आयी है। तीर्थंकर महावीर के समय प्राकृत भाषा भारतीय परिवार की एक सुसमृद्ध लोकभाषा रही और उसी लोकभाषा प्राकृत में तीर्थंकर महावीर ने अपना उपदेश दिया। तीर्थंकर महावीर के शिष्य गणधरों द्वारा रचित आचारांग, सूत्रकृतांग आदि बारह मूल आगम ग्रंथ काल के प्रभाव से लुप्त हो गये। तीर्थंकर महावीर के निर्वाण के 200-300 सौ वर्षों के बाद सम्राट चन्द्रगुप्त के राज्यकाल में मगध में 12 वर्ष तक भीषण अकाल पडने के परिणामस्वरूप जैन मत में दो सम्प्रदाय हुए 1.दिगम्बर 2.श्वेताम्बर | तीर्थंकर महावीर की दिगम्बर परम्परा में आगे आचार्य गुणधर से लेकर आचार्य भूतबलि, आचार्य पुष्पदन्त, आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य यतिवृषभ, आचार्य वट्टेकर, आचार्य शिवार्य आदि अनेक आचार्य हुए। इन सभी आचार्यों ने अपने ग्रंथों की रचना प्राकृत में की जो शौरसेनी प्राकृत के नाम से जानी गई। इस शौरसेनी प्राकृत से ही आगे चलकर अपभ्रंश भाषा विकसित हुई। दिगम्बर परम्परा के आचार्य योगीन्दु, मुनि रामसिंहं, आचार्य देचसेन, मुनि कनकामर, मुनि नयंनंदी आदि ने अपभ्रंश भाषा में ग्रंथ रचना की। आचार्य जिनसेन, आचार्य उमास्वामी, आचार्य गुणभद्र, आचार्य रविषेण आदि ने संस्कृत भाषा में ग्रंथ रचना की। यदि हम आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों को सही रूप में समझकर अपनी आदर्श प्राचीन परम्परा से जुडना चाहते हैं तो हमें तत्कालीन प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तथा संस्कृत भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। इन भाषाओं का ज्ञान होने पर ही हम आचार्य द्वारा कथित बात को आसानी से और सही रूप में समझ सकेंगे तथा अपनी आदर्श परम्परा से जुडकर प्रसन्न रहेंगे। सर्वप्रथम हम अपभ्रंश भाषा को सीखें और उसके बाद अपभ्रंश भाषा के आद्य अध्यात्म ग्रंथ परमात्मप्रकाश तथा अपभ्रंश के महत्वपूर्ण चरिउकाव्यों तथा मुक्तक काव्यों का भाषा के साथ अध्ययन करें। इससे हम अपभ्रंश युगीन जीवन मूल्यों को जान सकेंगे। अपभ्रंश भाषा व साहित्य के अध्ययन के बाद हम प्राकृत भाषा को सीखकर आचार्य कुन्द कुन्द देव के समग्र साहित्य का अध्ययन प्राकृत भाषा के आधार से करेंगे। इससे हम आचार्य कुन्दकुन्द युगीन जीवनमूल्यों से परिचित हो सकेंगे। तभी हम यह अनुभव कर पायेंगे कि आज हम कहीं आत्म प्रदर्शन से अपने आत्मा के मूल स्वभाव से दूर तो नहीं चले गये हैं तथा ठीक उसी प्रकार धर्म के अति प्रदर्शन से हम अपने मूल धर्म से दूर तो नहीं हो रहे हैं और यही तो हमारे अनवरत दुःखों का कारण तो नहीं है। यह सब जानने के लिए हम सर्वप्रथम भारतीय भाषाओं के मध्य प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा का क्या स्थान है इसे संक्षेप में समझते हैं और उसके बाद अपभ्रंश को सीखने का प्रयास करते हैं। अपभ्रंश को सीखने के बाद प्राकृत भाषा का अध्ययन करेंगे। अपभ्रंश भाषा सीखने के बाद प्राकृत भाषा को सीखना बहुत आसान होगा। तो सर्व प्रथम हम देखते हैं भारतीय भाषाओं में प्राकृत एवं अपभ्रंश का स्थान । पाठ - 1 भारतीय भाषाओं में प्राकृत संस्कृत एवं अपभ्रंश का स्थान प्रत्येक युग में साहित्य व बोलचाल की स्वाभाविक भाषा सदैव साथ चलती आई है। यही बोलचाल की भाषा उस साहित्यिक भाषा को नया जीवन प्रदान कर सदैव विकसित होती चली है। भारतदेश की भाषा के विकास को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। 1. प्रथम स्तर: आद्य कथ्य भाषा, छान्द्स एवं संस्कृत (ईसा पूर्व 2000 से ईसा पूर्व 600 तक) - वैदिक साहित्य से पूर्व भारतदेश के अनेक प्रदेशों में बोली जाने वाली प्राकृत भाषाओं को ही भारतदेश की आद्य कथ्य भाषा माना गया है। इन प्रादेशिक भाषाओं के विविध रूपों के आधार से ही वैदिक साहित्य की रचना हुई और वैदिक साहित्य की भाषा को ‘छान्दस’ कहा गया। यह छान्द्स उस समय की साहित्यिक भाषा बन गई। पाणिनी ने अपने समय तक चली आई छान्द्स की परम्परा को व्याकरण द्वारा नियन्त्रित एवं स्थिरता प्रदान कर लौकिक संस्कृत नाम दिया। इस तरह वैदिक भाषा (छान्द्स) और लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव वैदिक काल की आद्य कथ्य प्राकृत भाषाओं से ही हुआ है, यही भारतीय भाषा के विकास का प्रथम स्तर है। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि पाणिनी द्वारा छान्द्स (वैदिक) भाषा के आधार से जिस लौकिक संस्कृत भाषा का उद्भव हुआ, उसमें पाणिनी के बाद कोई परिवर्तन नहीं हुआ, जबकि वैदिक युग की कथ्य रूप से प्रचलित प्रादेशिक प्राकृत भाषाओं में परवर्ती काल में अनेक परिवर्तन हुए। भारतीय भाषा के इस द्वितीय स्तर को तीन युगों में विभक्त किया गया है। 2. द्वितीय स्तरः प्राकृत साहित्य (ईसापूर्व 600 से ईसवी 200 तक) - प्रथमयुगः- (ई.पूर्व 600से इ्र्र. 200 तक) इसमें तीर्थंकर महावीर के उपदेश की भाषा प्राकृत, शिलालेखी प्राकृत, धम्मपद की प्राकृत, आर्ष-पालि, प्राचीन जैन सूत्रों की प्राकृत, अश्वघोष के नाटकों की प्राकृत, बोद्ध जातकों की भाषाएँ आती हैं। मध्य युगीनः- (200 ई. से 600 ई. तक) इसमें भाष और कालिदास के नाटकों की प्राकृत, गीतिकाव्य और महाकाव्यों की प्राकृत, परवर्ती जैन काव्य साहित्य की प्राकृत, प्राकृत वैयाकरणों द्वारा निरूपित और अनुशासित प्राकृतें एवं वृहत्कथा की पैशाची प्राकृत है। तृतीय युगीनः-(600 से 1200 ई. तक) भिन्न भिन्न प्रदेशों की परवर्तीकाल की अपभ्रंश भाषाएँ। 3.तृतीय स्तरः (1200 ईस्वी से आगे तक) - पुनः अपभ्रंश भाषा के जन साधारण में अप्रचलित होने से ईस्वी की पंचम शताब्दी के पूर्व से लेकर दशम शताब्दी पर्यन्त भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों में कथ्यभाषाओं के रूप में प्रचलित जिस-जिस अपभ्रंश भाषा से भिन्न भिन्न प्रदेश की जो-जो आधुनिक आर्य कथ्य भाषा उत्पन्न हुई है उसका विवरण इस प्रकार है - मराठी-अपभ्रंश से - मराठी और कोंकणी भाषा। मागधी अपभ्रंश की पूर्व शाखा से - बंगला,उडिया और आसामी भाषा। मागधी-अपभ्रंश की बिहारी शाखा से - मैथिली,मगही,और भोजपुरिया। अर्ध मागधी-अपभ्रंश से - पूर्वीय हिन्दी भाषाएँ अर्थात अवधी,बघेली,छत्तीसगढी़। सौरसेनी अपभ्रंश से - बुन्देली,कन्नोजी,ब्रजभाषा,बाँगरू,हिन्दी । नागर अपभ्रंश से - राजस्थानी,मालवा,मेवाड़ी,जयपुरी,मारवाड़ी तथा गुजराती। पाली से - सिंहली और मालदीवन । टाक्की अथवा ढाक्की से - लहन्डी या पश्चिमीय पंजाबी । ब्राचड अपभ्रंश से - सिन्धी भाषा । पैशाची अपभ्रंश से - कश्मीरी भाषा। इस प्रकार हम देखते है कि अपभ्रंश मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा की अन्तिम अवस्था तथा प्राचीन और नवीन भारतीय आर्यभाषाओं के बीच का सेतुबन्ध है। इसका परवर्ती नव्य भारतीय आर्यभाषाओं के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है। मराठी, गुजराती,राजस्थानी, उड़िया, बंगाली,असमिया आदि सभी आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के विकास में अपभ्रंश की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिन्दी भाषा तो इसकी साक्षात उत्तराधिकारिणी है। इस प्रकार आरम्भिक जन भाषा से आधुनिक भारतीय भाषाओं के विषय में संक्षेप में जानकारी प्राप्त की।
  5. मुनिश्री ब्रह्मानन्द महाराज की समाधि पंचम युग में चतुर्थकालीन चर्या का पालन करने वाले व्योवर्द्ध महातपस्वी परम् पूजनीय मुनिश्री ब्रह्मनन्द जी महामुनिराज ने समस्त आहार जल त्याग कर उत्कृष्ट समाधि पूर्वक देह त्याग दी। परम् पुज्य मुनिश्री ऐसे महान तपस्वी रहें है जिनकी चर्या का जिक्र अक्सर आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महामुनिराज संघस्थ साधुगण एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज प्रवचन के दौरान करते थे। पिड़ावा के श्रावकजनो ने मुनिश्री की संलेखना के समय अभूतपुर्व सेवा एवं वैयावर्ती की है। ऐसे समाधिस्थ पुज्य मुनिराज के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन। मुनिराज का समाधिमरण अभी दोपहर 1:35 पर हुआ उनकी उत्क्रष्ट भावना अनुसार 48 मिनट के भीतर ही देह की अंतेष्टि की जाएगी। (20,अप्रैल,2018) कर्नाटक प्रांत के हारुवेरी कस्बे में जन्मे महान साधक छुल्लक श्री मणिभद्र सागर जी 80 के दशक आत्मकल्याण और जिनधर्म की प्रभावना करते हुऐ मध्यप्रदेश में प्रवेश किया । छुल्लक अवस्था मे चतुर्थकालीन मुनियों सी चर्या । कठिन तप ,त्याग के कारण छुल्लक जी ने जँहा भी प्रवास किया वँहा अनूठी छाप छोड़ी। पीड़ित मानवता के लिए महाराज श्री के मन मे असीम वात्सल्य था। महाराज श्री की प्रेरणा से तेंदूखेड़ा(नरसिंहपुर)मप्र में समाज सेवी संस्था का गठन किया गया। लगभग बीस वर्षों तक इस संस्था द्वारा हजारों नेत्ररोगियों को निःशुल्क नेत्र शिवरों के माध्यम से नेत्र ज्योति प्रदान की गई। जरूरतमंद समाज के गरीब असहाय लोगों को आर्थिक सहयोग संस्था द्वारा किया जाता था। आज भी लगभग बीस वर्षों तक महाराज श्री की प्रेणना से संचालित इस संस्था ने समाज सेवा के अनेक कार्य किये । छुल्लक मणिभद्र सागर जी ने मप्र के सिलवानी नगर में आचार्य श्री विद्यासागर जी के शिष्य मुनि श्री सरल सागर जी से मुनि दीक्षा धारण की और नाम मिला मुनि श्री ब्रम्हांन्द सागर जी। इस अवसर पर अन्य दो दीक्षाएं और हुईं जिनमे मुनि आत्मा नन्द सागर, छुल्लक स्वरूपानन्द सागर,। महाराज श्री का बरेली,सिलवानी, तेंदूखेड़ा,महाराजपुर,केसली,सहजपुर,टडा, वीना आदि विभिन्न स्थानों पर सन 1985 से से लगातार सानिध्य ,बर्षायोग, ग्रीष्मकालीन,शीतकालीन सानिध्य प्राप्त होते रहे।। महाराज श्री को आहार देने वाले पात्र का रात्रि भोजन,होटल,गड़न्त्र, का आजीवन त्याग, होना आवश्यक था। और बहुत सारे नियम आहार देने वाले पात्र के लिए आवश्यक थे। महाराज श्री को निमित्य ज्ञान था। जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण मेरे स्वयं के पास है। उनके द्वारा कही बात मैने सत्य होते देखी है। आज 20 अप्रेल मध्यान 1:45 पर पंचम युग में चतुर्थकालीन चर्या' का पालन करने वाले व्योवर्द्ध महातपस्वी परम् पूजनीय मुनिश्री ब्रह्मनन्द जी महामुनिराज ने समस्त आहार जल त्याग कर उत्कृष्ट समाधि पूर्वक देह त्याग दी। परम् पुज्य मुनिश्री ऐसे महान तपस्वी रहें है जिनकी चर्या का जिक्र अक्सर आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महामुनिराज संघस्थ साधुगण एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज प्रवचन के दौरान करते थे। पिड़ावा के श्रावकजनो ने मुनिश्री की संलेखना के समय अभूतपुर्व सेवा एवं वैयावर्ती की है। ऐसे समाधिस्थ पुज्य मुनिराज के पावन चरणों में कोटि कोटि नमन। महाराज श्री की भावना अनुसार 48 मिनिट के भीतर ही उनकी अंतिम क्रियाएं की जाएंगी। मुनि श्री को बारम्बार नमोस्तु 👏 🙏🏼नमोस्तु मुनिवर🙏🏼
  6. ☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं, आप जान रहे हैं एक ऐसे महापुरुष की आत्मकथा जिनका जन्म तो अजैन कुल में हुआ था लेकिन जो आत्मकल्याण हेतु संयम मार्ग पर चले तथा वर्तमान में सुलभ दिख रही जैन संस्कृति के सम्बर्धन का श्रेय उन्ही को जाता है। प्रस्तुत अंशो से हम लोग देख रहे हैं पूज्य वर्णी ने कितनी सहजता से अपनी ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आई सभी बातों को प्रस्तुत किया है। 🍀 संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी🍀 *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"* *क्रमांक -६४* ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था। आपके भोजन की व्यवस्था श्रीमान बरैयाजी ने मेरे जिम्मे कर दी। चतुर्दशी का दिन था। पंडितजी ने कहा बाजार से पूड़ी तथा शाक ले आओ।' मैं बाजार गया और हलवाई के यहाँ से पूडी तथा शाक ले आ रहा था कि मार्ग में देवयोग से श्रीमान पं. नंदराम जी साहब पुनः मिल गये। मैंने प्रणाम किया। पंडितजी ने देखते ही पूछा- 'कहाँ गये थे? मैंने कहा- पंडितजी के लिए बाजार से पूडी शाक लेने गया था।' उन्होंने कहा- 'किस पंडितजी के लिए?' मैंने उत्तर दिया- 'हरिपुर जिला इलाहाबाद के पंडित श्री ठाकुरप्रसाद जी के लिए, जोकि दिगम्बर जैन महाविद्यालय मथुरा में पढ़ाने के लिए नियुक्त हुए हैं।' अच्छा, बताओ शाक क्या है? मैंने कहा - 'आलू और बैगन का।' सुनते ही पंडितजी साहब अत्यन्त कुपित हुए। क्रोध से झल्लाते हुए बोले- 'अरे मूर्ख नादान ! आज चतुर्दशी के दिन यह क्या अनर्थ किया?' मैंने धीमे स्वर में कहा- 'महाराज ! मैं तो छात्र हूँ? मैं अपने खाने को तो नहीं लाया, कौन सा अनर्थ इसमें हो गया? मैं तो आपकी दया का पात्र हूँ।' 🌿 *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*🌿 🔹आजकी तिथि- वैशाख कृष्ण ७🔹
  7. जय बोलो श्री महावीर भगवान की। शुभकामनाएं के साथ बधाई ।
  8. ”सत्य” ”अहिंसा” धर्म हमारा, ”नवकार” हमारी शान है, ”महावीर” जैसा नायक पाया…. ”जैन हमारी पहचान है.” महावीर भगवान के जन्म कल्याण दिवस की शुभकामनाएँ एवं बधाई
  9. विचारणीय है कि वे कौन-से गुण और कार्य थे जिनके कारण भगवान् महावीर भगवान् बने और सबके स्मरणीय हुए। आचार्यों द्वारा संग्रथित उनके सिद्धान्तों और उपदेशों से उनके वे गुण और कार्य हमें अवगत होते हैं। महावीर ने अपने में नि:सीम अहिंसा की प्रतिष्ठा की थी। इस अहिंसा की प्रतिष्ठा से ही उन्होंने अपने उन समस्त काम-क्रोधादि विकारों को जीत लिया था। कितना ही क्रूर एवं विरोधी उनके समक्ष पहुँचता, वह उन्हें देखते ही नतमस्तक हो जाता था, वे उक्त विकारों से ग्रस्त दुनिया से इसी कारण ऊँचे उठ गये थे। उन्होंने अहिंसा से खुद अपना जीवन बनाया और अपने उपदेशों द्वारा दूसरों का भी जीवन-निर्माण किया। एक अहिंसा की साधना में से ही उन्हें त्याग, क्षमता, सहनशीलता, सहानुभूति, मृदुता, ऋजुता, सत्य, निर्लोभता, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, ज्ञान आदि अनन्त गुण प्राप्त हुए और इन गुणों से वे लोकप्रिय तथा लोकनायक बने। लोकनायक ही नहीं, मोक्षमार्ग के नेता भी बने। हिंसा और विषमताओं का जो नग्न ताण्डव-प्रदर्शन उस समय हो रहा था, उन्हें एक अहिंसा-अस्त्र द्वारा ही उन्होंने दूर किया और शान्ति की स्थापना की। आज विश्व में भीतर और बाहर जो अशान्ति और भय विद्यमान है उनका मूल कारण हिंसा एवं आधिपत्य की कलुषित दुर्भावनाएँ हैं। वास्तव में यदि विश्व में शान्ति स्थापित करनी है और पारस्परिक भयों को मिटाना है तो एकमात्र अमोघ अस्त्र ‘अहिंसा' का अवलम्बन एवं आचरण है। हम थोड़ी देर को यह समझ लें कि हिंसक अस्त्रों से भयभीत करके शान्ति स्थापित कर लेंगे, तो यह समझना निरी भूल होगी। आतंक का असर सदा अस्थायी होता है। पिछले जितने भी युद्ध हुए वे बतलाते हैं कि स्थायी शान्ति उनसे नहीं हो सकी है। अन्यथा एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा युद्ध कदापि न होता। आज जिनके पास शक्ति है वे भले ही उससे यह सन्तोष कर लें कि विश्वशान्ति का उन्हें नुस्खा मिल गया, क्योंकि हिंसक शक्ति हमेशा बरबादी ही करती है। दूसरे के अस्तित्व को मिटा कर स्वयं कोई जिन्दा नहीं रह सकता। अत: अणुबम, उद्जन बम आदि जितने भी हिंसाजनक साधन हैं उन्हें समाप्त कर अहिंसक एवं सद्भावनापूर्ण प्रयत्नों से शान्ति और निर्भयता स्थापित करनी चाहिए | हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि हिंसा का पूरा विरोध किया जाय। जिन-जिन चीजों से हिंसा होती है अथवा की जाती है उन सबका सख्त विरोध किया जाय। इसके लिये देश के भीतर और बाहर जबर्दस्त आन्दोलन किया जाय तथा विश्वव्यापी हिंसाविरोधी संगठन कायम किया जाय। यह संगठन निम्न प्रकार से हिंसा का विरोध करे - अणुबम, उद्जनबम जैसे संहारक वैज्ञानिक साधनों के आविष्कार और प्रयोग रोके जायें तथा हितकारक एवं संरक्षक साधनों के विकास व प्रयोग किये जायें। अन्न तथा शाकाहार का व्यापक प्रचार किया जाय और मांसभक्षण का निषेध किया जाय। पशु-पक्षियों पर किये जाने वाले निर्मम अत्याचार रोके जायें। कसाईखाने बन्द किये जायें। उपयोगी पशुओं का वध तो सर्वथा बन्द किया जाय। बन्दर, कुत्ते, बिल्ली आदि पर वैज्ञानिक प्रयोग न किये जायें। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने का अधिकार है। हीन, पतित, लूले-लंगड़े और गरीबों के जीवन का विकास किया जाय और उनकी रक्षा की जाय। उद्योग, व्यापार और लेन-देन के व्यवहार में भ्रष्टाचार न किया जाय और परिहार्य हिंसा का वर्जन किया जाय। धर्म के नाम से देवी-देवताओं के समक्ष होने वाली पशुबलि को रोका जाय। जीवित जानवरों को मारकर उनका चमड़ा निकालने का हिंसक कार्य बन्द किया जाय। नैतिक एवं अहिंसक नागरिक बनने का व्यापक प्रचार किया जाय। विश्वास है कि इस विषय में अहिंसा प्रेमी जोरदार एवं व्यापक आन्दोलन करेंगे।
  10. शान्ति और सुख ऐसे जीवन-मूल्य हैं जिनकी चाह मानवमात्र को रहती है। अशान्ति और दु:ख किसी को भी इष्ट नहीं, ऐसा सभी का अनुभव है। अस्पताल के उस रोगी से पूछिए, जो किसी पीड़ा से कराह रहा है और डाक्टर से शीघ्र स्वस्थ होने के लिए कातर होकर याचना करता है। वह रोगी यही उत्तर देगा कि हम पीड़ा की उपशान्ति और चैन चाहते हैं। उस गरीब और दीन-हीन आदमी से प्रश्न करिए, जो अभावों से पीड़ित है। वह भी यही जवाब देगा कि हमें ये अभाव न सतायें और हम सुख से जिएँ। उस अमीर और साधनसम्पन्न व्यक्ति को भी टटोलिए, जो बाह्य साधनों से भरपूर होते हुए भी रात-दिन चिन्तित है। वह भी शान्ति और सुख की इच्छा व्यक्त करेगा। युद्धभूमि में लड़ रहे उस योद्धा से भी सवाल करिए, जो देश की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने के लिए उद्यत है। उसका भी उत्तर यही मिलेगा कि वह अन्तरंग में शान्ति और सुख का इच्छुक है। इस तरह विभिन्न स्थितियों में फँसे व्यक्ति की आन्तरिक चाह शान्ति और सुख प्राप्ति की मिलेगी। वह मनुष्य में, चाहे वह किसी भी देश, किसी भी जाति और किसी भी वर्ग का हो, पायी जायेगी। इष्ट का संवेदन होने पर उसे शान्ति और सुख मिलता है तथा अनिष्ट का संवेदन उसके अशान्ति और दु:ख का परिचायक होता है। इस सर्वेक्षण से हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य के जीवन का मूल्य शान्ति और सुख है। यह बात उस समय और अधिक अनुभव में आ जाती है जब हम किसी युद्ध से विरत होते हैं या किसी भारी परेशानी से मुक्त होते हैं। दर्शन और सिद्धान्त ऐसे अनुभवों के आधार से ही निर्मित होते हैं और शाश्वत बन जाते हैं। जब मन में क्रोध की उदभूति होती है तो उसके भयंकर परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं। क्रुद्ध जर्मनी ने जब जापान युद्ध में उसके दो नगरों को बमों से ध्वंस कर दिया तो विश्व ने उसकी भर्त्सना की। फलत: सब ओर से शान्ति की चाह की गयी। क्रोध के विषैले कीटाणु केवल आस-पास के वातावरण और क्षेत्र को ही ध्वस्त नहीं करते, स्वयं क्रुद्ध का भी नाश कर देते हैं। हिटलर और मुसोलिनी के क्रोध ने उन्हें विश्व के चित्रपट से सदा के लिए अस्त कर दिया। दूर न जायें, पाकिस्तान ने जो क्रोधोन्माद का प्रदर्शन किया उससे उसके पूर्वी हिस्से को उसने हमेशा के लिए अलग कर दिया। व्यक्ति का क्रोध कभी-कभी भारी से भारी हानि पहुँचा देता है। इसके उदाहरण देने की जरूरत नहीं है। वह सर्वविदित है। क्षमा एक ऐसा अस्त्रबल है जो क्रोध के वार को निरर्थक ही नहीं करता, क्रोधी को नमित भी करा देता है। क्षमा से क्षमावान् की रक्षा होती है, उससे उनकी भी रक्षा होती है, जिन पर वह की जाती है। क्षमा वह सुगन्ध है जो आस-पास के वातावरण को महका देती है और धीरे-धीरे हरेक हृदय में वह बैठ जाती है। क्षमा भीतर से उपजती है, अतः उसमें भय का लेशमात्र भी अंश नहीं रहता। वह वीरों का बल है, कायरों का नहीं। कायर तो क्षण-क्षण में भीत और विजित होता रहता है। पर क्षमावान् निर्भय और विजयी होता है। वह ऐसी विजय प्राप्त करता है जो शत्रु को भी उसका बना देती है। क्षमावान् को क्रोध आता ही नहीं, उससे वह कोसों दूर रहता है। वास्तव में क्षमा - क्षमता - सहनशीलता मनुष्य का एक ऐसा गुण है जो दो नहीं, तीन नहीं हजारों, लाखों और करोड़ों मनुष्यों को जोड़ता है, उन्हें एक दूसरे के निकट लाता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी विश्वसंस्था इसी के बल पर खड़ी हो सकी है और जब तक उसमें यह गुण रहेगा तब तक वह बना रहेगा। तीर्थंकर महावीर में यह गुण असीम था। फलतः उनके निकट जाति और प्रकृति विरोधी प्राणी - सर्प-नेवला, सिंह-गाय जैसे भी आपस के वैर-भाव को भूलकर आश्रय लेते थे, मनुष्यों का तो कहना हो क्या। उनकी दृष्टि में मनुष्यमात्र एक थे। हाँ, गुणों के विकास की अपेक्षा उनका दर्जा ऊँचा होता जाता था और अपना स्थान ग्रहण करता जाता था। जिनकी दृष्टि पूत हो जाती थी वे सम्यक्दृष्टि, जिनका दृष्टि के साथ ज्ञान पवित्र (असद्भावमुक्त) हो जाता था वे सम्यग्ज्ञानी और जिनका दृष्टि और ज्ञान के साथ आचरण भी पावन हो जाता था वे सम्यक्चारित्री कहे जाते थे और वैसा ही उन्हें मान-सम्मान मिलता था। क्षमा यथार्थ में अहिंसा की ही एक प्रकाशपूर्ण किरण है, जिससे अन्तरतम सु-आलोकित हो जाता है। अहिंसक प्रथमत: आत्मा और मन को बलिष्ठ बनाने के लिए इस क्षमा को भीतर से विकसित करता, गाढ़ा बनाता और उन्नत करता है। क्षमा के उन्नत होने पर उसकी रक्षा के लिए हृदय में कोमलता, सरलता और निर्भीकवृत्ति की बाड़ी (वृक्षावलि) रोपता है। अहिंसा को ही सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए सत्य, अचौर्य, शील और अपरिग्रह की निर्मल एवं उदात्त वृत्तियों का भी वह अहर्निश आचरण करता है। सामान्यतया अहिंसा उसे कहा जाता है जो किसी प्राणी को न मारा जाय। परन्तु यह अहिंसा की बहुत स्थूल परिभाषा है। तीर्थंकर महावीर ने अहिंसा उसे बतलाया जिसमें किसी प्राणी को मारने का न मन में विचार आये, न वाणी से कुछ कहा जाय और न हाथ आदि की क्रियाएँ की जाये। तात्पर्य यह कि हिंसा के विचार, हिंसा के वचन और हिंसा के प्रयत्न न करना अहिंसा है। यही कारण है कि एक व्यक्ति हिंसा का विचार न रखता हुआ ऐसे वचन बोल देता है या उनकी क्रिया हो जाती है जिससे किसी जीव की हिंसा सम्भव है तो उसे हिंसक नहीं माना गया है। प्रमत्तयोग-कषाय से होनेवाला प्राणव्यपरोपण ही हिंसा है। हिंसा और अहिंसा वस्तुतः व्यक्ति के भावों पर निर्भर हैं। व्यक्ति के भाव हिंसा के हैं। तो वह हिंसक है और यदि उसके भाव हिंसा के नहीं हैं तो वह अहिंसक है। इस विषय में हमें वह मछुआ और कृषक ध्यातव्य है जो जलाशय में जाल फैलाये बैठा है और प्रतिक्षण मछली-ग्रहण का भाव रखता है, पर मछली पकड़ में नहीं आती तथा जो खेत जोतकर अन्न उपजाता है और किसी जीव के घात का भाव नहीं रखता, पर अनेक जीव खेत जोतने से मरते हैं। वास्तव में मछुआ के क्षणक्षण के परिणाम हिंसा के होने से वह हिंसक कहा जाता है और कृषक के भाव हिंसा के न होकर अन्न उपजाने के होने से वह अहिंसक माना जाता है। महावीर ने हिंसा-अहिंसा को भावप्रधान बतलाकर उसकी सामान्य परिभाषा से कुछ ऊँचे उठकर उक्त सूक्ष्म परिभाषाएँ प्रस्तुत की। ये परिभाषायें ऐसी हैं जो हमें पाप और वंचना से बचाती हैं तथा तथ्य को स्पर्श करती हैं। अहिंसक खेती कर सकता है, व्यापार-धंधे कर सकता है और जीवन-रक्षा तथा देश-रक्षा के लिए शस्त्र भी उठा सकता है, क्योंकि उसका भाव आत्मरक्षा का है, आक्रमण का नहीं। यदि वह आक्रमण होने पर उसे सह लेता है तो उसकी वह अहिंसा नहीं है, कायरता है। कायरता से वह आक्रमण सहता है और कायरता में भय आ ही जाता है तथा भय हिंसा का ही एक भेद है। वह परघात न करते हुए भी स्वघात करता है। अत: महावीर ने अहिंसा की बारीकी को न केवल स्वयं समझा और आचरित किया, अपितु उसे उस रूप में ही आचरण करने का दूसरों को भी उन्होंने उपदेश दिया। यदि आज का मनुष्य मनुष्य से प्रेम करना चाहता है और मानवता की रक्षा करना चाहता है तो उसे महावीर की इन सूक्ष्म क्षमा और अहिंसा को अपनाना ही पड़ेगा। यह सम्भव नहीं कि बाहर से हम मनुष्य-प्रेम की दुहाई दें और भीतर से कटार चलाते रहें। मनुष्य-प्रेम के लिए अन्तस् और बाहर दोनों में एक होना चाहिए। कदाचित् हम बाहर प्रेम का प्रदर्शन न करें, तो न करें, किन्तु अन्त में तो वह अवश्य हो, तभी विश्वमानवता जी सकती है और उसके जीने पर अन्य शक्तियों पर भी करुणा के भाव विकसित हो सकते हैं। क्षमा और अहिंसा ऐसे उच्च सद्भावपूर्ण आचरण हैं जिनके होते ही समाज में, देश में, विश्व में और जन-जन में प्रेम और करुणा के अंकुर उगकर फूलफल सकते हैं तथा सबको सुखी बना सकते हैं।
  11. महावीर और तत्कालीन स्थिति - लोक में महापुरुषों का जन्म जन-जीवन को ऊँचा उठाने और उनका हित करने के लिए होता है। भगवान् महावीर ऐसे ही महापुरुष थे। उनमें लोककल्याण की तीव्र भावना, असाधारण प्रतिभा, अद्वितीय तेज और अनुपम आत्मबल था। बचपन से ही उनमें अलौकिक धार्मिक भाव और सर्वोदय की सातिशय लगन होने के नेतृत्व, लोकप्रियता और अद्दभुत संगठन के गुण विकसित होने लगे थे। भौतिकता के प्रति उनकी न आसक्ति थी और न आस्था। उनका विश्वास आत्मा के केवल अमरत्व में ही नहीं, किन्तु उसके पूर्ण विकसित रूप परमात्मत्व में भी था। अतएव वे इन्द्रिय-विषयों को तापकृत् और तृष्णाभिवर्द्धक मानते थे। एक लोकपूज्य एवं सर्वमान्य ज्ञातृवंशी क्षत्रिय घराने में उत्पन्न होकर और वहाँ सभी सामग्रियों के सुलभ होने पर भी वे राजमहलों में तीस वर्ष तक 'जल में भिन्न कमल' की भाँति अथवा गीता के शब्दों में स्थितप्रज्ञ' की तरह रहे, पर उन्हें कोई इन्द्रिय-विषय लुभा न सका। उनकी आँखों से बाह्य स्थिति भी ओझल न थी। राजनैतिक स्थिति यद्यपि उस समय बहुत ही सुदृढ़ और आदर्श थी। नौ लिच्छिवियों का संयुक्त एवं संगठित शासन था और वे बड़े प्रेम एवं सहयोग से अपने गणराज्य का संचालन करते थे। राजा चेटक इस गणराज्य के सुयोग्य अध्यक्ष थे और वैशाली उनकी राजधानी थी। वैशाली राजनैतिक हलचलों तथा लिच्छवियों की प्रवृत्तियों की केन्द्र थी; पर सबसे बड़ी जो न्यूनता थी वह यह थी कि शासन समाज और धर्म के मामले में मौन था - उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। फलत: सामाजिक और धार्मिक पतन पराकाष्ठा को पहुँच चुका था तथा दोनों की दशा अत्यन्त विरूप धारण कर चुकी थी। छुआछूत, जातीयता और ऊँच-नीच के भेद ने समाज तथा धर्म की जड़ों को खोखला एवं जर्जरित बना दिया था। अज्ञान, मिथ्यात्व, पाखण्ड और अधर्म ने अपना डेरा डाल रखा था। इस बाह्य स्थिति ने भी भगवान् महावीर की आँखों को अद्दभुत प्रकाश दिया और वे तीस वर्ष की भरी जवानी में ही समस्त वैषयिक सुखोपभोगों को त्यागकर और उनसे विरक्ति धारण कर साधु बन गये थे। उन्होंने अनुभव किया। था कि गृहस्थ या राजा के पद की अपेक्षा साधु का पद अत्यन्त उन्नत है और इस पद में ही तप, त्याग तथा संयम की उच्चाराधना की जा सकती है और आत्मा को ‘परमात्मा' बनाया जा सकता है। फलस्वरूप उन्होंने बारह वर्ष तक कठोर तप और संयम की आराधना करके अपने चरम लक्ष्य वीतराग-सर्वज्ञत्व अथवा परमात्मत्व की शुद्ध एवं परमोच्च अवस्था को प्राप्त किया था। महावीर द्वारा आचार धर्म की प्रतिष्ठा - उन्होंने जिस 'सुपथ' पर चलकर इतनी उन्नति की और असीम ज्ञान एवं अक्षय आनन्द को प्राप्त किया, उस ‘सुपथ' को जनकल्याण के लिए भी उन्होंने उसी तरह प्रदर्शित किया, जिस तरह सद्वैद्य बड़े परिश्रम और कठोर साधना से प्राप्त अपने अनुपम चिकित्सा-ज्ञान द्वारा करुणा-बुद्धि से रोग-पीड़ित लोगों का रोगोपशमन करता है और उन्हें जीवन-दान देता है। महावीर के 'आचार-धर्म' पर चलकर प्रत्येक व्यक्ति लौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकार के हितों को कर सकता है। आज के इस चाकचिक्य एवं भौतिकता-प्रिय जगत् में उनके 'आचार-धर्म' के आचरण की बड़ी आवश्यकता है। महाभारत के एक उपाख्यान में निम्न श्लोक आया है - जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः, जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन हृदि स्थितेन, यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।। मैं धर्म को जानता हूँ , पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म को भी जानता हूँ, लेकिन उससे निवृत्ति नहीं। हृदय में स्थित कोई देव जैसी मुझे प्रेरणा करता है, वैसा करता हूँ। यथार्थतः यही स्थिति आज अमनीषी और मनीषी दोनों की हो रही है। बाह्य में वे भले ही धर्मात्मा हों, पर अन्तस् प्रायः सभी का तमोव्याप्त है। परिणाम यह हो रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक और आध्यात्मिक चेतना शून्य होती जा रही है और भौतिक चेतना एवं वैषयिक इच्छाएँ बढ़ती जा रही हैं। यदि यही भयावह दशा रही तो मानव-समाज में न नैतिकता रहेगी और न आध्यात्मिकता तथा न वैसे व्यक्तियों का सद्भाव कहीं मिलेगा। अतः इस भौतिकता के युग में भगवान् महावीर का 'अचारधर्म' विश्व के मानव समाज को बहुत कुछ आलोक दे सकता है - आध्यात्मिक एवं नैतिक मार्गदर्शन कर सकता है। उसके आचरण से मानव नियत मर्यादा में रहता हुआ ऐन्द्रियिक विषयों को भोग सकता है और जीवन को नैतिक तथा आध्यात्मिक बनाकर उसे सुखी, यशस्वी और सब सुविधाओं से सम्पन्न भी बना सकता है। दूसरों को भी शान्ति और सुख प्रदान कर सकता है। अहिंसक व्यवहार की आवश्यकता मानव-समाज सुख और शान्ति से रहे, इसके लिए महावीर ने अहिंसा धर्म का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि दूसरों को सुखी देखकर सुखी होना और दु:खी देखकर दु:खी होना ही पारस्परिक प्रेम का एकमात्र साधन है। प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह किसी भी मनुष्य, पशु या पक्षी, यहाँ तक कि छोटे-से- छोटे जन्तु, कीट, पतंग आदि को भी न सताये। प्रत्येक जीव सुख चाहता है और दु:ख से बचना चाहता है। इसका शक्य उपाय यही है कि वह स्वयं अपने प्रयत्न से दूसरों को दु:खी न करे और सम्भव हो तो उन्हें सुखी बनाने की ही चेष्टा करे। ऐसा करने पर वह सहज में सुखी हो सकता है। अत: पारस्परिक अहिंसक व्यवहार ही सुख का सबसे बड़ा और प्रधान साधन है। इस अहिंसक व्यवहार को स्थायी बनाये रखने के लिए उसके चार उपसाधन हैं - 1.पहला यह कि किसी को धोखा न दिया जाय, जिससे जो कहा हो, उसे पूरा किया जाय। ऐसे शब्दों का भी प्रयोग न किया जाय, जिससे दूसरों को मार्मिक पीड़ा पहुँचे। जैसे अन्धे को अन्धा कहना या काणे को काणा कहना सत्य है, पर उन्हें पीड़ाजनक है। 2. दसरा उपसाधन यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने परिश्रम और न्याय से उपार्जित द्रव्य पर ही अपना अधिकार माने। जिस वस्तु का वह स्वामी नहीं है। और न उसे अपने तथा न्याय से अर्जित किया है उसका वह स्वामी न बने। यदि कोई व्यवसायी व्यक्ति उत्पादक और परिश्रमशील प्रजा का न्याययुक्त भाग हड़पता है तो वह व्यवसायी नहीं। व्यवसायी वह है जो न्याय से द्रव्य का अर्जन करता है। छल फरेब, धोखाधड़ी या जोरजबर्दस्ती से नहीं। अन्यथा वह प्रजा की अशान्ति तथा कलह का कारण बन जायगा। अतः न्यायविरुद्ध द्रव्य का अर्जन दुख तथा संक्लेश का बीज है, उसे नहीं करना चाहिए। 3. तीसरा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) को भोगों में आसक्त नहीं होना चाहिए। भोगों में आसक्त व्यक्ति अपना तथा दूसरों का अहित करता है। वह न केवल अपना स्वास्थ्य ही नष्ट करता है, अपितु ज्ञान, विवेक, त्याग, पवित्रता, उच्चकुलीनता आदि कितने ही सद्दगुणों का भी नाश करता है और भावी सन्तान को निर्बल बनाता है तथा समाज में दुराचार एवं दुर्बलता को प्रश्रय देता है। अतः प्रत्येक पुरुष को अपनी पत्नी के साथ और प्रत्येक स्त्री को अपने पति के साथ संयमित जीवन बिताना चाहिए। 4. चौथा यह है कि संचयवृत्ति को सीमित करना चाहिए, क्योंकि आवश्यकता से अधिक संग्रह करने से मनुष्य की तृष्णा बढ़ती है तथा समाज में असन्तोष फैलता है। यदि वस्तुओं का अनुचित रीति से संग्रह न किया जाय और प्राप्त पर सन्तोष रखा जाय तो दूसरों को जीवन निर्वाह के साधनों की कमी नहीं पड़ सकती। इस तरह अहिंसा को जीवन में लाने के लिए सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रहपरिमाण - इन चार नियमों का पालन करना आवश्यक है। उनके बिना अहिंसा पल नहीं सकती - पूर्णरूप में वह जीवन में नहीं आ सकती। यही पाँच व्रत भगवान् महावीर के आचार-धर्म हैं। आचार-धर्म का मूलाधार : अहिंसा - ऊपर देख चुके हैं कि इस आचार-धर्म का मूलाधार 'अहिंसा' है, शेष चार व्रत तो उसी तरह उसके रक्षक हैं जिस तरह खेती की रक्षा के लिए बाढ़ (वारी) लगा दी जाती है। यह देखा जाता है कि गलत बात कहने, कटु बोलने, असंगत कहने और अधिक बोलने से न केवल हानि ही उठानी पड़ती है किन्तु कलुषता, अविश्वास और कलह भी उत्पन्न हो जाते हैं। जो वस्तु अपनी नहीं, उसे बिना मालिक की आज्ञा से ले लेने पर वस्तु के स्वामी को दु:ख और रोष होता है। परपुरुष या परस्त्री गमन भी अशान्ति तथा ताप का कारण है। परिग्रह का आधिक्य तो स्पष्टत: संक्लेश और आपत्तियों का जनक है। इस प्रकार असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रह - ये चारों ही पापवृत्तियाँ हिंसा के बढ़ाने में सहायक हैं। इसलिए इनके त्याग में अहिंसा के ही पालन का लक्ष्य निहित है। अतएव अहिंसा को 'परम धर्म' कहा गया है। द्रव्यहिंसा और भावहिंसा - अहिंसा के स्वरूप को समझने के लिये हमें पहले हिंसा का स्वरूप समझ लेना आवश्यक है। भगवान् महावीर ने हिंसा की व्याख्या करते हुए बतलाया कि ‘प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा' अर्थात् दुष्ट अभिप्राय से प्राणी को चोट पहुँचाना हिंसा है। सामान्यतया हिंसा चार प्रकार की है - संकल्पी, आरंभी, उद्योगी और विरोधी। इन चारों हिंसाओं में चोट पहुँचाना' समान है, पर संकल्पी (जानबूझकर की जाने वाली) हिंसा में दुष्ट अभिप्राय होने से उसका गृहस्थ के लिए त्याग और शेष तीन हिंसाओं में दुष्ट अभिप्राय न होने से उनका अत्याग बतलाया गया है। वास्तव में उन तीन हिंसाओं में केवल द्रव्यहिंसा होती है और संकल्पी हिंसा में द्रव्यहिंसा और भावहिंसा दोनों ही हिंसाएँ होती हैं। जैनधर्म में बिना भावहिंसा के कोरी द्रव्य-हिंसा को पापबन्ध का कारण नहीं माना गया है। गृहस्थ अपने और परिवार के भरण-पोषण के लिए आरम्भ तथा उद्योग करता है और कभी-कभी अपनी, अपने परिवार, अपने समाज और अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए आक्रान्ता से लड़ाई भी लड़ता है और उसमें हिंसा होती ही है। परन्तु आरम्भ, उद्योग और विरोध के करते समय उसका दुष्ट अभिप्राय न होने से वह अहिंसक है तथा उसकी ये हिंसाएँ क्षम्य हैं, क्योंकि उसका लक्ष्य केवल न्याययुक्त भरण-पोषण तथा रक्षा का होता है। अतएव जैनधर्म के अनुसार अपने द्वारा किसी प्राणी के मर जाने या दु:खी होने से ही हिंसा नहीं होती। संसार में सर्वत्र जीव पाये जाते हैं और वे अपने निमित्त से मरते भी रहते हैं। फिर भी जैनधर्म इस ‘प्राणिघात' को हिंसा नहीं कहता। यथार्थ में 'हिंसारूप परिणाम' ही हिंसा है। एक किसान प्रातः से शाम तक खेत में हल जोतता है और उसमें बीसियों जीवों का घात होता है, पर उसे हिंसक नहीं कहा गया। किन्तु एक मछुआ नदी के किनारे सुबह से सूर्यास्त तक जाल डाले बैठा रहता है और एक भी मछली उसके जाल में नहीं आती। फिर भी उसे हिंसक माना गया है। इसका कारण स्पष्ट है। किसान का हिंसा का भाव नहीं है - उसका भाव अनाज उपजाने का है और मछुआ का भाव प्रतिसमय तीव्र हिंसा का रहता है। जैन विद्वान् आशाधर ने निम्न श्लोक में यही प्रदर्शित किया है - विष्वग्जीव-चिते लोके क्व चरन् कोऽप्यमोक्ष्यत। भावैकसाधनौ बन्ध-मोक्षौ चेन्नाभविष्यताम्॥ 'यदि भावों पर बन्ध और मोक्ष निर्भर न हों तो सारा संसार जीवराशि से खचाखच भरा होने से कोई मुक्त नहीं हो सकता है।' जैनागम में स्पष्ट कहा गया है - मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा। पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामेत्तेण समिदस्स।। ‘जीव मरे या चाहे जिये' असावधानी से काम करने वाले व्यक्ति को नियम से हिंसा का पाप लगता है। परन्तु सावधानी से प्रवृत्ति करने वाले को हिंसा होने मात्र से हिंसा का पाप नहीं लगता।' जैन पुराण युद्धों के वर्णनों से भरे पड़े हैं और उन युद्धों में अच्छे अणुव्रतियों ने भाग लिया है। पद्मपुराण में लड़ाई पर जाते हुए क्षत्रियों के वर्णन में एक सेनानी का चित्रण निम्न प्रकार किया है - सम्यग्दर्शनसम्पन्नः शूरः कश्चिदणुव्रती। पृष्ठतो वीक्ष्यते पत्न्या पुरस्त्रिदशकन्यया॥ 'एक सम्यग्दृष्टि और अणुव्रती सिपाही जब युद्ध में जा रहा है, तो उसे पीछे से उसकी पत्नी देख रही है और विचारती है कि मेरा पति कायर बन कर युद्ध से न लौटे - वहीं वीरगति प्राप्त करे और सामने से देवकन्या देखती है - यह वीर देवगति पाये और चाह रही है कि मैं उसे वरण करूँ।' यह सिपाही सम्यग्दृष्टि भी है और अणुव्रती भी। फिर भी वह युद्ध में जा रहा है, जहाँ असंख्य मनुष्यों का घात होगा। इस सिपाही का उद्देश्य मात्र आक्रान्ता से अपने देश की रक्षा करना है। दूसरे के देश पर हमला कर उसे विजित करने या उस पर अधिकार जमाने जैसा दुष्ट अभिप्राय उसका नहीं है। अत: वह द्रव्यहिंसा करता हुआ भी अहिंसा-अणुव्रती बना हुआ है। उसके अहिंसा-अणुव्रत में कोई दूषण नहीं आता। जैन धर्म में एक 'समाधिमरण' व्रत का वर्णन आता है, जो आयु के अन्त में और कुछ परिस्थितियों में जीवन-भर पाले हुए आचार-धर्म की रक्षा के लिए ग्रहण किया जाता है। इस व्रत में द्रव्य-हिंसा तो होती है पर भाव-हिंसा नहीं होती; क्योंकि उक्त व्रत उसी स्थिति में ग्रहण किया जाता है, जब जीवन के बचने की आशा नहीं रहती और आत्मधर्म के नष्ट होने की स्थिति उपस्थित हो जाती है। इस व्रत के धारक के परिणाम संक्लिष्ट न होकर विशुद्ध होते हैं। वह उसी प्रकार आत्मधर्म-रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग करता है जिस प्रकार एक बहादुर वीर सेनानी राष्ट्र-रक्षा के लिए हँसते-हँसते आत्मोत्सर्ग कर देता है और पीठ नहीं फेरता। यही कारण है कि इस व्रत का धारक वीर सेनानी की भाँति अहिंसक माना गया है। यदि कोई व्यक्ति इस व्रत का दुरुपयोग करता है तो किसी भी अच्छी बात का दुरुपयोग हो सकता है। बंगाल में 'अन्तक्रिया' का बहुत दुरुपयोग होता था। अनेक लोग वृद्धा स्त्री को गंगा किनारे ले जाते थे और उससे कहते थे - 'हरि बोल' अगर उसने 'हरि' बोल दिया तो उसे जीते ही गंगा में बहा देते थे। परन्तु वह 'हरि' नहीं बोलती थी, इससे उसे बार-बार पानी में डुबा-डुबाकर निकालते थे और जब तक वह 'हरि' न बोले तब तक उसे इसी प्रकार परेशान करते थे, जिससे घबराकर वह 'हरि' बोल दिया करती थी और वे लोग उसे स्वर्ग पहुँचा देते थे। 'अन्तक्रिया' का यह दुरुपयोग ही था। समाधिमरणव्रत का भी कोई दुरुपयोग कर सकता है। परन्तु दुरुपयोग के डर से अच्छे काम का त्याग नहीं किया जाता। किन्तु यथासाध्य दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ नियम बनाये जाते हैं। समाधिमरणव्रत के विषय में भी जैनधर्म में नियम बनाये गये हैं। अनशन कितना महत्त्वपूर्ण एवं आत्मशुद्धि और प्रायश्चित्त का साधन है। गाँधीजी उसका प्रयोग आत्मशुद्धि के लिए किया करते थे। किन्तु अपनी बात मनवाने के लिए आज उसका भी दुरुपयोग होने लगा है। लेकिन इस दुरुपयोग से अनशन का न महत्त्व कम हो सकता है और न उसकी आवश्यकता समाप्त हो सकती है। इस विवेचन से हम द्रव्य-हिंसा और भाव-हिंसा के अन्तर को सहज में समझ सकते हैं और भाव-हिंसा को ही हिंसा जान सकते हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि जैनधर्म में द्रव्यहिंसा की छूट दे दी गई है। यथा-शक्य प्रयत्न उसको " भी बचाने के लिए उपदेश दिया गया है और आचार-शुद्धि में उसका बड़ा स्थान माना गया है। इस द्रव्यहिंसा के हो जाने पर व्रती (गृहस्थ और साधु दोनों) प्रतिक्रमण और प्रायश्चित्त करते हैं। छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े सभी जीवों में क्षमा-याचना की जाती है और प्रायश्चित्त में स्वयं या गुरु से कृतापराध के लिए दण्ड स्वीकार किया जाता है। जान पड़ता है कि जैनों के इस प्रतिक्रमण और प्रायश्चित्त का पारसी धर्म पर भी प्रभाव पड़ा है। उनके यहाँ भी पश्चात्ताप करने का रिवाज है। इस क्रिया से जो मंत्र बोले जाते हैं उनमें से कुछ का भाव इस प्रकार है -'धातु उपधातु के साथ जो मैंने दुर्व्यवहार किया हो, उसका मैं पश्चात्ताप करता हूँ।' 'जमीन के साथ जो मैंने अपराध किया हो, उसका मैं पश्चात्ताप करता हूँ।' 'पानी अथवा पानी के अन्य भेदों के साथ जो मैंने अपराध किया हो, उसका मैं पश्चात्ताप करता हूँ।' 'वृक्ष और वृक्ष के अन्य भेदों के साथ जो मैंने अपराध किया हो, उसका मैं पश्चात्ताप करता हूँ।' महताब, आफ़ताब, जलती अग्नि आदि के साथ जो मैंने अपराध किया हो, मैं उसका पश्चात्ताप करता हूँ।' पारसियों का यह विवेचन जैन-धर्म के प्रतिक्रमण से मिलता-जुलता है, जो पारसी धर्म पर जैनधर्म के प्रभाव का स्पष्ट सूचक है। अतः भाव-हिंसा को छोड़े बिना जिस तरह कोई व्यक्ति अहिंसक नहीं हो सकता, उसी तरह द्रव्य-हिंसा को छोड़े बिना निर्दोष आचार-शुद्धि नहीं पल सकती। इसलिए दोनों हिंसाओं को बचाने के लिए सदा प्रयत्न करना चाहिए। आचार-धर्म के आधार : गृहस्थ और साधु - इस तरह अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह - ये पाँच व्रत हैं। इन व्रतों को गृहस्थ और साधु दोनों पालते हैं। गृहस्थ इन्हें एक देशरूप से और साधु पूर्णरूप से पालन करते हैं। गृहस्थ के ये व्रत अणुव्रत कहलाते हैं और साधु के महाव्रत साधु का क्षेत्र विस्तृत होता है। उसकी सारी प्रवृत्तियाँ सर्वजन हिताय और सर्वोदय के लिए होती हैं। वह ज्ञान, ध्यान और तप में रत रहता हुआ वर्ग से, समाज से और राष्ट्र से बहुत ऊँचे उठ जाता है, उसकी दृष्टि में ये सब संकीर्ण क्षेत्र हो जाते हैं। समाज से वह कम लेकर और उसे अधिक देकर कृतार्थ होता है। लेकिन गृहस्थ पर अनेक उत्तरदायित्व हैं। अपनी प्राणरक्षा के अलावा उसके कुटुम्ब के प्रति, समाज के प्रति, धर्म के प्रति और राष्ट्र के प्रति भी कुछ कर्तव्य हैं। इन कर्तव्यों को पालन करने के लिए वह उक्त अहिंसा आदि व्रतों को अणुव्रत के रूप में ग्रहण करता है और इन स्वीकृत व्रतों की वृद्धि के लिए अन्य सात व्रतों को भी धारण करता है, जो इस प्रकार है - (1) अपने कार्य-क्षेत्र की गमनागमन की मर्यादा निश्चित कर लेना 'दिग्व्रत' है। यह व्रत जीवनभर के लिए ग्रहण किया जाता है। इस व्रत का प्रयोजन इच्छाओं की सीमा बांधना है। (2) दिग्व्रत की मर्यादा के भीतर ही उसे कुछ काल और क्षेत्र के लिए सीमित कर लेना - आने-जाने के क्षेत्र को कम कर लेना देशव्रत है। (3) तीसरा अनर्थदण्डव्रत है। इसमें व्यर्थ के कार्यों और प्रवृत्तियों का त्याग किया जाता है। ये तीनों व्रत अणुव्रतों के पोषक एवं वर्धक होने से गुणव्रत कहे जाते हैं। (4) सामायिक में आत्म-विचार किया जाता है और खोटे विकल्पों का त्याग होता है। (5) प्रोषधोपवास में उपवास द्वारा आत्मशक्ति का विकास एवं सहनशीलता का अभ्यास किया जाता है। (6) भोगोपभोगपरिमाण में दैनिक भोगों और उपभोगों की वस्तुओं का परिमाण किया जाता है। जो वस्तु एक बार ही भोगी जाती है वह भोग तथा जो बार-बार भोगने में आती है वह उपभोग है। जैसे - भोजन, पान आदि एक बार भोगने में आने से भोग वस्तुएँ है और वस्त्र, वाहन आदि बार-बार भोगने में आने से उपभोग वस्तुएँ हैं। इन दोनों ही प्रकार की वस्तुओं का प्रतिदिन नियम लेना भोगोपभोगपरिमाण व्रत है। (7) अतिथिसंविभाग में सुपात्रों को विद्या, औषधि, भोजन और सुरक्षा का दान दिया जाता है, जिससे व्यक्ति का उदारता गुण प्रकट होता है। तथा इनके अनुपालन से साधु बनने की शिक्षा (दिशा और प्रेरणा) मिलती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह सामाजिक जीवन-क्षेत्र में हो या राष्ट्रीय, इन 12 व्रतों का सरलता से पालन कर सकता है और अपने जीवन को सुखी एवं शान्तिपूर्ण बना सकता है।
  12. अन्तिम तीर्थंकर भगवान वीर ने लगभग 2550 वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त के विपुलाचल पर्वत पर स्थित होकर श्रावण कृष्णा प्रतिपदा की पुण्यवेला में, जब सूर्य का उदय प्राची से हो रहा था, संसार के संतप्त प्राणियों के संताप को दूर कर उन्हें परम शान्ति प्रदान करने वाला धर्मोपदेश दिया था। उनके धर्मोपदेश का यह प्रथम दिन था। इसके बाद भी लगातार उन्होंने तीस वर्ष तक अनेक देशदेशान्तरों में विहार करके पथभ्रष्टों को सत्पथ का प्रदर्शन कराया था, उन्हें सन्मार्ग पर लगाया था। उस समय जो महान् अज्ञान-तम सर्वत्र फैला हुआ था, उसे अपने अमृत-मय उपदेशों द्वारा दूर किया था। लोगों की भूलों को अपनी दिव्य वाणी से बताकर उन्हें तत्त्वपथ ग्रहण कराया था, सम्यक्दृष्टि बनाया था। उनके उपदेश हमेशा दया एवं अहिंसा से ओत-प्रोत हुआ करते थे। यही कारण था कि उस समय की हिंसामय स्थिति अहिंसा में परिणत हो गयी थी और यही वजह थी कि इन्द्रभूति जैसे कट्टर वैदिक ब्राह्मण विद्वान् भी, जिन्हें बाद को भगवान वीर के उपदेशों के संकलनकर्ता - मुख्य गणधर तक के पद का गौरव प्राप्त हुआ है, उनके उपाश्रय में आये और अन्त में उन्होंने मुक्ति को प्राप्त किया। इस तरह भगवान वीर ने अवशिष्ट तीस वर्ष के जीवन में संख्यातीत प्राणियों का उद्धार किया और जगत को परम हितकारक सच्चे धर्म का उपदेश दिया। वीर का यह सब दिव्य उपदेश ही 'वीरशासन' या 'वीरतीर्थ' है और इस तीर्थ को चलाने-प्रवृत्त करने के कारण ही वे 'तीर्थंकर' कहे जाते हैं। वर्तमान में उन्हीं का शासन - तीर्थ चल रहा है। यह वीर-शासन क्या है? उसके महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त कौन से हैं? और उसमें क्या-क्या उल्लेखनीय विशेषतायें हैं? इन बातों से बहुत कम सज्जन अवगत हैं। अतः इन्हीं बातों पर संक्षेप में कुछ विचार किया जाता है। समन्तभद्र स्वामी ने, जो महान् तार्किक एवं परीक्षाप्रधानी प्रसिद्ध जैन आचार्य थे और जो आज से लगभग 1800 वर्ष पूर्व हो चुके हैं, भगवान महावीर और उनके शासन की सयुक्तिक परीक्षा एवं जाँच की है - 'युक्तिमद्वचन' अथवा ‘युक्तिशास्त्राविरोधिवचन' और 'निर्दोषता' की कसौटी पर उन्हें और उनके शासन को खूब कसा है। जब उनकी परीक्षा में भगवान् महावीर और उनका शासन सौटंकी स्वर्ण की तरह ठीक साबित हुये तभी उन्हें अपनाया है। इतना ही नहीं, किन्तु भगवान् वीर और उनके शासन की परीक्षा करने के लिये अन्य परीक्षकों तथा विचारकों को भी आमन्त्रित किया है - निष्पक्ष विचार के लिये खुला निमंत्रण दिया है। समन्तभद्र स्वामी के ऐसे कुछ परीक्षा-वाक्य थोड़े-से ऊहापोह के साथ नीचे दिये जाते हैं देवागमनभोयानचामरादिविभूतयः। मायाविष्वपि दृश्यन्ते नातस्त्वमसि नो महान् ॥ (आप्तमीमांसा 1) 'हे वीर? देवों का आना, आकाश में चलना, चमर, छत्र, सिंहासन आदि विभूतियों का होना तो मायावियों - इन्द्रजालियों में भी देखा जाता है, इस वजह से आप हमारे महान् - पूज्य नहीं हो सकते और न इन बातों से आपकी कोई महत्ता या बड़ाई है। समन्तभद्र स्वामी ने ऐसे अनेक परीक्षा-वाक्यों द्वारा उनकी और उनके शासन की परीक्षा की है, जिनका कथन सूत्ररूप से आप्त-मीमांसा में दिया हुआ है। परीक्षा करने के बाद उन्हें उनमें महत्ता की जो बात मिली है और जिसके कारण भगवान् वीर को 'महान' तथा उनके शासन को 'अद्वितीय' माना है। वह यह है- त्वं शुद्धि-शक्त्योरदियस्य काष्ठां, तुलाव्यतीतां जिन शान्तिरूपाम् । अवापिथ ब्रह्मपथस्य नेता, महानितीयत्प्रतिवक्तमीशाः॥ (युक्त्यनुशासन 4) ‘हे जिन ! आपने शुद्धि के - ज्ञानावरण और दर्शनावरणकर्म के क्षय से उत्पन्न आत्मीय ज्ञान-दर्शन के तथा शक्ति के - वीर्यान्तरायकर्म के क्षय से उत्पन्न आत्म बल के - परम प्रकर्ष को प्राप्त किया है - आप अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान और अनन्तवीर्य के धनी हैं। साथ ही अनुपम एवं अपरिमेय शान्तिरूपता को - अनन्तसुख को भी प्राप्त हैं, इसी से आप ‘ब्रह्मपथ' के - मोक्षमार्ग के - नेता हैं और इसीलिए आप महान् हैं - पूज्य हैं। ऐसा हम कहने - सिद्ध करने के लिए समर्थ हैं।' समन्तभद्र वीरशासन को अद्वितीय बतलाते हुए लिखते हैं - दया-दम-त्याग-समाधि-निष्ठं, नयप्रमाणप्रकृताञ्जसार्थम्। अधृष्यमन्यैरखिलैः प्रवादेर्जिन त्वदीयं मतमद्वितीयम्॥ ( युक्त्यनुशासन) हे वीर जिन! आपका मत - शासन नय और प्रमाणों के द्वारा वस्तुतत्त्व को बिलकुल स्पष्ट करनेवाला है और अन्य समस्त एकान्तवादियों से अबाध्य है - अखंडनीय है, साथ में दया - अहिंसा, दम - इन्द्रिय - निग्रहरूप संयम, त्याग - दान अथवा समस्त परिग्रह का परित्याग और समाधि - प्रशस्त ध्यान इन चारों की तत्परता को लिये हुये है, इसलिए वह 'अद्वितीय' है। दया के बिना दम - संयम नहीं बन सकता और संयम के बिना त्याग नहीं और त्याग के बिना समाधि - प्रशस्त ध्यान नहीं हो सकता, इसी से वीरशासन में दया - अहिंसा को प्रधान स्थान प्राप्त है। 'वीर-शासन' की इस महत्ता को बतलाने के बाद समन्तभद्र उसे ‘सर्वोदयतीर्थ' भी बदलाते हैं सर्वान्तवत्तद्दगुणमुख्यकल्पं सर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम्। सर्वापदामन्तकरं निरन्तं सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव॥ (युक्त्यनुशासन) ‘हे वीर ! आपका तीर्थ - शासन अथवा परमागम-द्वादशाङ्गश्रुत-समस्त धर्मों वाला है और मुख्य-गौण की अपेक्षा समस्त धर्मों की व्यवस्था से युक्त है - एक धर्म के प्रधान होने पर अन्य बाकी धर्म गौण मात्र हो जाते हैं - उनका अभाव नहीं होता। किन्तु एकान्तवादियों का आगमवाक्य अथवा शासन परस्पर निरपेक्ष होने से सब धर्मों वाला नहीं है - उनके यहाँ धर्मों में परस्पर अपेक्षा न होने से दूसरे धर्मों का अभाव हो जाता है और उनके अभाव हो जाने पर उस अविनाभावी अभिप्रेत धर्म का भी अभाव हो जाता है। इस तरह एकान्त में न वाच्यत्त्व ही बनता है और न वाचकतत्त्व ही। और इसलिए हे वीर जिनेन्द्र ! परस्पर की अपेक्षा रखने के कारण - अनेकान्तमय होने के कारण - आपका ही तीर्थ - शासन सम्पूर्ण आपदाओं का अन्त करने वाला है और स्वयं निरंत है - अंतरहित अविनाशी है। तथा सर्वोदयरूप है - समस्त अभ्युदयों - आध्यात्मिक और भौतिक विभूतियों का कारण है। तथा सर्व प्राणियों के अभ्युदय - अभ्युत्थान का हेतु है। समन्तभद्र के इन वाक्यों से यह भले प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुत: 'वीर-शासन' सर्वोदय तीर्थ कहलाने के योग्य है। उसमें वे विशेषताएँ एवं महत्तायें हैं, जो आज विश्व के लिए वीरशासन की देन कही जाती हैं या कही जा सकती हैं। यहाँ वे विशेषतायें भी कुछ निम्न प्रकार उल्लिखित हैं - वीरशासन की विशेषताएँ - 1.अहिंसावाद, 2.साम्यवाद, 3.स्याद्वाद और 4.कर्मवाद। इनके अलावा वीरशासन में और भी वाद हैं - आत्मवाद, ज्ञानवाद, चारित्रवाद, दर्शनवाद, प्रमाणवाद, नयवाद, परिग्रहपरिमाणवाद, प्रमेयवाद आदि। किन्तु उन सबका उल्लिखित चार वादों में ही प्राय: अन्तर्भाव हो जाता है। प्रमाणवाद और नयवाद के ही नामान्तर हैं और इनका तथा प्रमेयवाद का स्याद्वाद के साथ सम्बन्ध होने से स्याद्वाद में और बाकी का अहिंसावाद तथा साम्यवाद में अन्तर्भाव हो जाता है। 1. अहिंसावाद - 'स्वयं जियो और जीने दो' की शिक्षा भगवान् महावीर ने इस अहिंसावाद द्वारा दी थी। जो परम आत्मा, परमब्रह्म, परमसुखी होना चाहता है उसे अहिंसा की उपासना करनी चाहिये - उसे अपने समान ही सबको देखना चाहिये - अपना अहिंसक आचरण बनाना चाहिये। मनुष्य में जब तक हिंसक वृत्ति रहती है तब तक आत्मगुणों का विकास नहीं हो पाता - वह दु:खी, अशान्त बना रहता है। अहिंसक का जीवमात्र मित्र बन जाता है - सर्व वैर का त्याग करके जातिविरोधी जीव भी उसके आश्रय में आपस में हिलमिल जाते हैं। क्रोध, दम्भ, द्वेष, गर्व, लोभ आदि ये सब हिंसा की वृत्तियाँ हैं। ये सच्चे अहिंसक के पास में नहीं फटक पाती हैं। अहिंसक को कभी भय नहीं होता, वह निर्भीकता के साथ उपस्थित परिस्थिति का सामना करता है, कायरता से कभी पलायन नहीं करता। अहिंसा कायरों का धर्म नहीं है वह तो वीरों का धर्म है। कायरता का हिंसा के साथ और वीरता का अहिंसा के साथ सम्बन्ध है। शारीरिक बल का नाम वीरता नहीं, आत्मबल का नाम वीरता है। जिसका जितना अधिक आत्मबल विकसित होगा वह उतना ही अधिक वीर और अहिंसक होगा। शारीरिक बल कदाचित् ही सफल होता देखा गया है, लेकिन सूखी हड्डियों वाले का भी आत्मबल विजयी और अमोघ रहा है। अत: अहिंसा पर कायरता का लांछन लगाना निराधार है। भगवान् महावीर ने वह अहिंसा दो प्रकार की वर्णित की है - 1. गृहस्थ की अहिंसा, 2. साधु की अहिंसा। गृहस्थ-अहिंसा - गृहस्थ चार तरह की हिंसाओं - आरम्भी, उद्योगी, विरोधी और संकल्पी में केवल संकल्पी हिंसा का त्यागी होता है, बाकी की तीन तरह की हिंसाओं का त्यागी वह नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं है कि वह इन तीन तरह की हिंसाओं में असावधान बनकर प्रवृत्त रहता है, नहीं, आत्मरक्षा, जीवननिर्वाह आदि के लिये जितनी अनिवार्य हिंसा होगी वह उसे करेगा, फिर भी वह अपनी प्रवृत्ति हमेशा सावधानी से करेगा। उसका व्यवहार हमेशा नैतिक होगा। यही गृहस्थधर्म है, अन्य क्रियाएँ - आचरण तो इसी के पालन के दृष्टिबिन्दु हैं। साधु-अहिंसा - साधु की अहिंसा सब प्रकार की हिंसाओं के त्याग में से उदित होती है, उसकी अहिंसा में कोई विकल्प नहीं होता। वह अपने जीवन को सुवर्ण के समान निर्मल बनाने के लिए उपद्रवों, उपसर्गों को सहनशीलता के साथ सहन करता है। निन्दा करने वालों पर रुष्ट नहीं होता और स्तुति करने वालों पर प्रसन्न नहीं होता। वह सब पर साम्यवृत्ति रखता है। अपने को पूर्ण सावधान रखता है। तामसी और राजसी वृत्तियों से अपने आपको बचाये रखता है। मार्ग में चलेगा तो चार कदम जमीन देखकर चलेगा; जीव-जन्तुओं को बचाता हुआ चलेगा, हित-मित वचन बोलेगा, ज्यादा बकवाद नहीं करेगा। गरज यह कि जैन साधु अपनी तमाम प्रवृत्ति सावधानी से करता है। यह सब अहिंसा के लिए, अहिंसातत्त्व की उपासना के लिए, परमब्रह्म को प्राप्त करने के लिए, 'अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमं' इस समन्तभद्रोक्त तत्त्व को हासिल करने के लिए। इस तरह जैन साधु अपने जीवन को पूर्ण अहिंसामय बनाता हुआ, अहिंसा की साधना करता हुआ, जीवन को अहिंसाजन्य अनुपम शांति प्रदान करता हुआ, विकारी पुद्गल से अपना नाता तोड़ता हुआ, कर्म-बन्धन को काटता हुआ, अहिंसा में ही - परमब्रह्म में ही - शाश्वतानन्द में ही - निमग्न हो जाता है - लीन हो जाता है - सदा के लिए - अनन्तकाल के लिए। फिर उसे संसार का चक्कर नहीं लगाना पड़ता। वह अजर, अमर, अविनाशी हो जाता है। सिद्ध एवं कृतकृत्य बन जाता है यह सब अहिंसा के द्वारा ही। वीर-शासन की जड़ - बुनियाद - आधार और विकास अहिंसा ही है। वर्तमान में जैन समाज इस अहिंसा-तत्त्व को कुछ भूल-सा गया है। इसीलिये जैनेतर लोग उसके बाह्याचार को देखकर 'जैनी अहिंसा', 'वीर अहिंसा' पर कायरता का कलंक मढ़ते हुए पाये जाते हैं। क्या ही अच्छा हो, जैनी लोग अपने व्यवहार से अहिंसा को व्यावहारिक धर्म बनाये रखने से सच्चे अर्थों में 'जैनी' बने, आत्मबल पुष्ट करें, साहसी और वीर बनें, जितेन्द्रिय होवें। उनकी अहिंसा केवल चिंवटी-खटमल, जूं आदि की रक्षा तक ही सीमित न हो, जिससे दूसरे लोग हमारे दम्भपूर्ण व्यवहार - निरा अहिंसा के व्यवहार को देखकर वीर प्रभु की महती देन - अहिंसा पर कलंक न मढ़ सकें। 2. साम्यवाद - यह अहिंसा का ही अवान्तर सिद्धान्त है, लेकिन इस सिद्धान्त की हमारे जीवन में अहिंसा की ही भाँति अपनाये जाने की आवश्यकता होने से ‘अहिंसावाद' के समकक्ष इसकी गणना करना उपयुक्त है, क्योंकि भगवान् वीर के शासन में सबके साथ साम्य-भाव - सद्भावना के साथ व्यवहार करने का उपदेश है, अनुचित राग और द्वेष का त्यागना, दूसरों के साथ अन्याय तथा अत्याचार का बर्ताव नहीं करना, न्यायपूर्वक ही अपनी आजीविका सम्पादित करना, दूसरों के अधिकारों को हड़प नहीं करना, दूसरों की आजीविका पर नुकसान नहीं पहुँचाना, उनको अपने जैसा स्वतन्त्र और सुखी रहने का अधिकारी समझकर उनके साथ 'वसुधैव कुटुम्बकम्' - यथायोग्य भाईचारे का व्यवहार करना, उनके उत्कर्ष में सहायक होना, उनका कभी अपकर्ष नहीं सोचना, जीवनोपयोगी सामग्री को स्वयं उचित और आवश्यक रखना और दूसरों को रखने देना, संग्रह, लोलुपता, चूसने की वृत्ति का परित्याग करना ही ‘साम्यवाद' का लक्ष्य है - साम्यवाद की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। यदि आज विश्व में वीर प्रभु की यह साम्यवाद की शिक्षा प्रसृत हो जावे तो सारा विश्व सुखी और शांतिपूर्ण हो जाय। 3. स्याद्वाद अथवा अनेकान्तवाद - इसको जन्म देने का महान् श्रेय वीरशासन को ही है। प्रत्येक वस्तु के खरे और खोटे की जाँच 'अनेकान्त दृष्टि' - ‘स्याद्वाद' की कसौटी पर ही की जा सकती है। चूंकि वस्तु स्वयं अनेकान्तात्मक है उसको वैसा मानने में ही वस्तुतत्त्व की व्यवस्था होती है । स्याद्वाद के प्रभाव से वस्तु के स्वरूप-निर्णय में पूरा-पूरा प्रकाश प्राप्त होता है और सकल दुर्नयों एवं मिथ्या एकान्तों का अन्त हो जाता है तथा समन्वय का एक महानतम प्रशस्त मार्ग मिल जाता है। कुछ जैनेतर विचारकों ने स्याद्वाद को ठीक तरह से नहीं समझा। इसी से उन्होंने स्याद्वाद के खंडन में कुछ दूषण दिये हैं। शंकराचार्य ने 'एकस्मिन्नसंभवात्' द्वारा 'एक जगह दो विरोधी धर्म नहीं बन सकते हैं।' यह कहकर स्याद्वाद में विरोधदूषण दिया है। किन्हीं विद्वानों ने इसे संशयवाद, छलवाद कह दिया है, किन्तु विचारने पर इसमें इस प्रकार के कोई भी दूषण नहीं आते हैं। स्याद्वाद का प्रयोजन है यथावत् वस्तु तत्त्व का ज्ञान कराना, उसकी ठीक तरह से व्यवस्था करना, सब ओर से देखना और स्याद्वाद का अर्थ है कथंचित्वाद, दृष्टिवाद, अपेक्षावाद, सर्वथा एकान्त का त्याग, भिन्न-भिन्न पहलुओं से वस्तुस्वरूप का निरूपण, मुख्य और गौण की दृष्टि से पदार्थ का विचार'। स्याद्वाद में जो ‘स्यात्' शब्द है उसका अर्थ ही यही है कि किसी एक अपेक्षा से - सब प्रकार से नहीं - एक दृष्टि से - है। ‘स्यात्' शब्द का अर्थ 'शायद' नहीं है। देवराजव्यक्ति में अनेक सम्बन्ध विद्यमान हैं - किसी का वह मामा है तो किसी का भानजा, किसी का पिता है। तो किसी का पुत्र, इस तरह उसमें कई सम्बन्ध मौजूद हैं। मामा अपने भानजे की अपेक्षा, पिता अपने पुत्र की अपेक्षा, भानजा अपने मामा की अपेक्षा, पुत्र अपने पिता की अपेक्षा से है, इस प्रकार देवराज में पितृत्व, पुत्रत्व, मातुलत्व, स्वस्रीयत्व आदि धर्म निश्चित रूप ही हैं - संदिग्ध नहीं हैं और वे हर समय विद्यमान हैं। 'पिता' कहे जाने के समय पुत्रपना उनमें से भाग नहीं जाता है - सिर्फ गौण होकर रहता है। इसी तरह जब उनका भानजा उन्हें 'मामा-मामा' कहता है उस समय वे अपने मामा की अपेक्षा भानजे नहीं मिट जाते - उस समय भानजापना उनमें गौणमात्र होकर रहता है। स्याद्वाद इस तरह से वस्तुधर्मों की गुत्थियों को सुलझाता है - उनका यथावत् निश्चय कराता है? - स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव की अपेक्षा से ही वस्तु 'सत्' - अस्तित्ववान् है और परद्रव्य क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा से ही वस्तु 'असत्' - नास्तित्ववान् है आदि सात भङ्गों द्वारा ग्रहण करने योग्य और छोड़ने योग्य (गौण कर देने योग्य) पदार्थों का स्याद्वाद हस्तामलकवत् निर्णय करा देता है। संदेह या भ्रम को वह पैदा नहीं करता है। बल्कि स्याद्वाद का आश्रय लिये बिना वस्तुतत्त्व का यथातथ्य निर्णय हो ही नहीं सकता है। अतः स्याद्वाद को संदेहवाद समझना नितांत असाधारण भूल है। भिन्न दो अपेक्षाओं से विरोधी सरीखे दीख रहे (विरोधी नहीं) दो धर्मों के एक जगह रहने में कुछ भी विरोध नहीं है। जहाँ पुस्तक अपनी अपेक्षा अस्तित्वधर्मवाली है वहाँ अन्य पदार्थों की अपेक्षा नास्तित्वधर्मवाली भी है, पर-निषेध के बिना स्वस्वरूपास्तित्व प्रतिष्ठित नहीं हो सकता है। अत: यह स्पष्ट है कि स्याद्वाद में न विरोध है और न सन्देह जैसा अन्य कोई दूषण; वह तो वस्तुनिर्णय का - तत्त्वज्ञान का अद्वितीय अमोघ शस्त्र है, सबल साधन है। वस्तु चूँकि अनेक धर्मात्मक है और उसका व्यवस्थापक स्याद्वाद है इसलिये स्याद्वाद को ही अनेकान्तवाद भी कहते हैं। किन्तु 'अनेकान्त' और 'स्याद्वाद' में वाच्य-वाचक-सम्बन्ध है। 4. कर्मवाद - कर्म जड़ है, पौगलिक है, उसका जीव के साथ अनादिकालिक सम्बन्ध है। कर्म की वजह से ही जीव पराधीन है और सुख-दु:ख का अनुभव करता है। वह कर्म से अनेक पर्यायों को धारण करके चतुर्गति संसार में घूमता है। कभी ऊँचा बन जाता है तो कभी नीचा, कभी दरिद्र होता है तो कभी अमीर, कभी मूर्ख होता है तो कभी विद्वान्, कभी अन्धा होता है तो कभी बहिरा, कभी लंगड़ा होता है तो कभी बौना, इस तरह शुभाशुभ कर्मों की बदौलत दुनिया के रंगमंच पर नट की तरह अनेक भेषों को धारण करता है - अनगिनत पर्यायों में उपजता और मरता है। यह सब कर्म की विडम्बना - कर्म की प्रपञ्चना है। वीरशासन में कर्म के मूल और उत्तर भेद और उनके भी भेदों का बहुत ही सुन्दर, सूक्ष्म, विशद विवेचन किया है। बंध, बंधक, बन्ध्य और बन्धनीय तत्त्वों पर गहरा विचार किया है। जीव कैसे और कब कर्मबंध करता है इन सभी बातों का चिंतन किया गया है। कर्मवाद से हमें शिक्षा मिलती है कि हम स्वयं ऊँचे उठ सकते हैं और स्वयं ही नीचे गिर सकते हैं। वीरशासन में जीवादि सात तत्त्वों, सम्यक्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप मोक्षमार्ग और प्रमाण, नय, निक्षेप आदि उपायतत्त्वों का भी बहुत ही सम्बद्ध एवं संगत, विशद व्याख्यान किया गया है। प्रमाण के दो (प्रत्यक्ष और परोक्ष) भेद करके उन्हीं में अन्य सब प्रमाणों के अन्तर्भाव की विभावना कितने सुन्दर एवं युक्तिपूर्ण ढंग से की गई है, वह एक निष्पक्ष विचार को आकर्षित किये बिना नहीं रहती है। नयवाद तो जैन दर्शन की अन्यतम महत्त्वपूर्ण देन है। वस्तु के अंशज्ञान को नय कहते हैं। वे नय अनेक हैं। वस्तु के भिन्न-भिन्न अंशों को ग्रहण करने वाले नय ही हैं। ज्ञाता की हमेशा प्रमाण-दृष्टि नहीं रहती है। कभी उसका वस्तु के किसी खास धर्म को ही जानने का अभिप्राय होता है, उस समय उसकी नयदृष्टि होती है और इसीलिये ज्ञाता के अभिप्राय को जैन दर्शन में नय माना है। चूँकि वक्ता की वचन-प्रवृत्ति भी क्रमशः होती है - वचनों द्वारा वह एक अंश का ही प्रतिवचन कर सकता है। इसलिये वक्ता के वचन-व्यवहार को भी जैनदर्शन में 'नय' माना है। अतएव ज्ञानात्मक और वचनात्मकरूप से अथवा ज्ञानमय और शब्दनय के भेद से नय वर्णित हैं। इस तरह वीरशासन वैज्ञानिक एवं तात्त्विक शासन है। उसके अहिंसा, स्याद्वाद जैसे विश्वप्रिय सिद्धान्तों से उसकी उपयोगिता एवं आवश्यकता भी अधिक प्रकट होती है। वीरशासन के अनुयायी हम जैनों का परम कर्तव्य है कि भगवान् वीर के द्वारा उपदेशित उनके 'सर्वोदय तीर्थ' को विश्व में चमत्कृत करें और उनके पवित्र सिद्धान्तों का स्वयं ठीक तरह पालन करें तथा दूसरों को पालन करावें और उनके शासन का प्रसार करें।
  13. महावीर का जन्म। आज से लगभग 2600 वर्ष पहले लोकवन्द्य महावीर ने विश्व के लिए स्पृहणीय भारतवर्ष के अत्यन्त रमणीक पुण्य-प्रदेश विदेह देश (बिहार प्रान्त) के कुण्डपुर नगर में जन्म लिया था। 'कुण्डपुर' विदेह की राजधानी वैशाली (वर्तमान वसाढ़) के निकट बसा हुआ था और उस समय एक सुन्दर एवं स्वतन्त्र गणसत्तात्मक राज्य के रूप में अवस्थित था। इसके शासक सिद्धार्थ नरेश थे, जो लिच्छवी ज्ञातृवंशी थे और बड़े न्याय-नीति-कुशल एवं प्रजावत्सल थे। इनकी शासन-व्यवस्था अहिंसा और गणतंत्र (प्रजातंत्र) के सिद्धान्तों के आधार पर चलती थी। ये उस समय के नौ लिच्छवि (वज्जि) गणों में एक थे और उनमें इनका अच्छा सम्मान तथा आदर था। सिद्धार्थ भी उन्हें इसी तरह सम्मान देते थे। इसी से लिच्छवी गणों के बारे में उनके पारस्परिक प्रेम और संगठन को बतलाते हुए बौद्धों के दीघनिकाय-अट्ठकथा आदि प्राचीन ग्रन्थों में कहा गया है कि यदि कोई लिच्छवि बीमार होता तो सब लिच्छवि उसे देखने आते, एक के घर उत्सव होता तो उसमें सब सम्मिलित होते तथा यदि उनके नगर में कोई साधु-सन्त आता तो उसका स्वागत करते थे। इससे मालूम होता है कि अहिंसा के परम पुजारी नृप सिद्धार्थ के सूक्ष्म अहिंसक आचरण का कितना अधिक प्रभाव था? जो साथी नरेश जैन धर्म के उपासक नहीं थे वे भी सिद्धार्थ की अहिंसा-नीति का समर्थन करते थे और परस्पर भ्रातृत्वपूर्ण समानता का आदर्श उपस्थित करते थे। सिद्धार्थ के इन्हीं समभाव, प्रेम, संगठन, प्रभावादि गुणों से आकृष्ट होकर वैशाली के (जो विदेह देश की तत्कालीन सुन्दर राजधानी तथा लिच्छवि नरेशों के प्रजातंत्र की प्रवृत्तियों की केन्द्र एवं गौरवपूर्ण नगरी थी) प्रभावशाली नरेश चेटक ने अपनी गुणवती राजकुमारी त्रिशला का विवाह उनके साथ कर दिया था। त्रिशला चेटक को सबसे प्यारी पुत्री थी, इसलिए चेटक उन्हें 'प्रियकारिणी' भी कहा करते थे। त्रिशला अपने प्रभावशाली सुयोग्य पिता की सुयोग्य पुत्री होने के कारण पैतृक गुणों से सम्पन्न तथा उदारता, दया, विनय, शीलादि गुणों से भी युक्त थी। इसी भाग्यशाली दम्पति - त्रिशला और सिद्धार्थ - को लोकवन्द्य महावीर को जन्म देने का अचिन्त्य सौभाग्य प्राप्त हुआ। जिस दिन महावीर का जन्म हुआ वह चैत सुदी तेरस का पावन दिवस था। महावीर के जन्म लेते ही सिद्धार्थ और उनके परिवार ने पुत्र-जन्म के उपलक्ष्य में खूब खुशियाँ मनाईं। गरीबों को भरपूर धन-धान्य आदि दिया और सबकी मनोकामनाएँ पूरी कीं तथा तरह-तरह के गायन वादित्रादि करवाये। सिद्धार्थ के कुटुम्बीजनों, समशील मित्र नरेशों, रिश्तेदारों और प्रजाजनों ने भी उन्हें बधाइयाँ भेजीं, खुशियाँ मनाईं और याचकों को दानादि दिया। महावीर बाल्यावस्था में ही विशिष्ट ज्ञानवान् और अद्वितीय बुद्धिमान् थे। बड़ी से बड़ी शंका का समाधान कर देते थे। साधु-सन्त भी अपनी शंकाएँ पूछने आते थे। इसीलिए लोगों ने उन्हें सन्मति कहना शुरू कर दिया और इस तरह वर्धमान का लोक में एक 'सन्मति' नाम भी प्रसिद्ध हो गया। वह बड़े वीर भी थे। भयंकर आपदाओं से भी नहीं घबड़ाते थे, किन्तु उनका साहसपूर्वक सामना करते थे। अतः उनके साथी उन्हें वीर और अतिवीर भी कहते थे। महावीर का वैराग्य - महावीर इस तरह बाल्यावस्था को अतिक्रान्त कर धीरे-धीरे कुमारावस्था को प्राप्त हुए और कुमारावस्था को भी छोड़कर वे पूरे 30 वर्ष के युवा हो गये। अब उनके माता-पिता ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। किंतु महावीर तो महावीर ही थे। उस समय जनसाधारण की जो दुर्दशा थी उसे देखकर उन्हें असह्य पीड़ा हो रही थी। उस समय की अज्ञानमय स्थिति को देखकर उसकी आत्मा सिहर उठी थी और हृदय दया से भर आया था। अतएव उनके हृदय में पूर्ण रूप से वैराग्य समा चुका था। उन्होंने सोचा - इस समय देश की स्थिति धार्मिक दृष्टि से बड़ी खराब है, धर्म के नाम पर अधर्म हो रहा है। जहाँ देखो वहाँ हिंसा का बोलबाला और भीषण काण्ड मचा हुआ है। सारी पृथ्वी खून से लथपथ हो रही है। इसके अतिरिक्त स्त्री के साथ इस समय जो दुर्व्यवहार हो रहा है वह भी चरमसीमा पर पहुँच चुका है। उसे ज्ञान से वंचित रखा जा रहा है। शूद्र के साथ संभाषण, उसका अन्नभक्षण और उसके साथ सभी प्रकार का व्यवहार बन्द कर रखा है और यदि कोई करता है तो उसे कड़े-से-कड़ा दण्ड भोगना पड़ता है। यदि किसी से अज्ञानतावश या भूल से कोई अपराध बन गया तो उसे जाति, धर्म और तमाम उत्तम बातों से च्युत करके बहिष्कृत कर दिया जाता है - उनके उद्धार का कोई रास्ता ही नहीं है। यह भी नहीं सोचा जाता कि मनुष्य मनुष्य है, देवता नहीं। उससे गलतियाँ हो सकती हैं और उनका सुधार भी हो सकता है। महावीर इस अज्ञानमय स्थिति को देखकर खिन्न हो उठे, उनकी आत्मा सिहर उठी और हृदय दया से भर आया। वे सोचने लगे कि यदि यह स्थिति कुछ। समय और रही तो अहिंसक और आध्यात्मिक ऋषियों की यह पवित्र भारतभूमि नरककुण्ड बन जायगी और मानव दानव हो जायगा। जिस भारत भूमि के मस्तक को ऋषभदेव, राम और अरिष्टनेमि जैसे अहिंसक महापुरुषों ने ऊँचा किया और अपने कार्यों से उसे पावन बनाया, उसके माथे पर हिंसा का वह भीषण कलंक लगेगा जो धुल न सकेगा। इस हिंसा और जड़ता को शीघ्र ही दूर करना चाहिए। यद्यपि राजकीय दण्ड-विधान - आदेश से यह बहुत कुछ दूर हो सकती है, पर उसका असर लोगों के शरीर पर ही पड़ेगा - हृदय एवं आत्मा पर नहीं। आत्मा पर असर डालने के लिए तो अन्दर की आवाज - उपदेश ही होना चाहिए और वह उपदेश पूर्ण सफल एवं कल्याणप्रद तभी हो सकता है जब मैं स्वयं पूर्ण अहिंसा की प्रतिष्ठा कर लें। इसलिए अब मेरा घर में रहना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। घर में रहकर सुखोपभोग करना और अहिंसा की पूर्ण साधना करना दोनों बातें सम्भव नहीं हैं। यह सोचकर उन्होंने घर छोड़ने का निश्चय कर लिया। उनके इस निश्चय को जानकर माता त्रिशला, पिता सिद्धार्थ और सभी प्रियजन अवाक् रह गये, परन्तु उनकी दृढ़ता को देखकर उन्हें संसार के कल्याण के मार्ग से रोकना उचित नहीं समझा और सबने उन्हें इसके लिए अनुमति दे दी। संसार-भीरु सभ्यजनों ने भी उनके इस लोकोत्तर कार्य की प्रशंसा की और गुणानुवाद किया। महावीर की निर्ग्रन्थ-दीक्षा - राजकुमार महावीर सब तरह के सुखों और राज्य का त्याग कर निर्ग्रन्थअचेल हो वन-वन में, पहाड़ों की गुफाओं और वृक्षों की कोटरों में समाधि लगाकर अहिंसा की साधना करने लगे। काम-क्रोध, राग-द्वेष, मोह-माया, छल ईर्ष्य आदि आत्मा के अन्तरंग शत्रुओं पर विजय पाने लगे। वे जो कायक्लेशादि बाह्य तप तपते थे वह अन्तरंग की ज्ञानादि शक्तियों को विकसित व पुष्ट करने के लिए करते थे। उन पर जो विघ्न-बाधाएँ और उपसर्ग आते थे उन्हें वे वीरता के साथ सहते थे। इस प्रकार लगातार बारह वर्ष तक मौनपूर्वक तपश्चरण करने के पश्चात् उन्होंने कर्मकलंक को नाशकर अर्हत अर्थात् ‘जीवन्मुक्त' अवस्था प्राप्त की। आत्मा के विकास की सबसे ऊँची अवस्था संसार दशा में यही 'अर्हत् अवस्था' है जो लोकपूज्य और लोक के लिए स्पृहणीय है। बौद्धग्रन्थों में इसी को 'अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध' कहा है। उनका उपदेश - इस प्रकार महावीर ने अपने उद्देश्यानुसार आत्मा में अहिंसा की पूर्ण प्रतिष्ठा कर ली, समस्त जीवों पर उनका समभाव हो गया - उनकी दृष्टि में न कोई शत्रु रहा और न कोई मित्र। सर्प-नेवला, सिंह-गाय जैसे जाति-विरोधी जीव भी उनके सान्निध्य में आकर अपने वैर-विरोध को भूल गये। वातावरण में अपूर्व शान्ति आ गई। महावीर के इस स्वाभाविक आत्मिक प्रभाव से आकृष्ट होकर लोग स्वयमेव उनके पास आने लगे। महावीर ने उचित अवसर और समय देखकर लोगों को अहिंसा का उपदेश देना प्रारम्भ कर दिया। 'अहिंसा परमोधर्म:' कह कर अहिंसा को परमधर्म और हिंसा को अधर्म बतलाया। यज्ञों में होने वाली पशुबलि को अधर्म कहा और उसका अनुभव तथा युक्तियों द्वारा तीव्र विरोध किया। जगह-जगह जाकर विशाल सभाएँ करके उसकी बुराइयाँ बतलाईं और अहिंसा के अपरिमित लाभ बतलाये। इस तरह लगातार तीस वर्ष तक उन्होंने अहिंसा का प्रभावशाली प्रचार किया। प्रत्येक योग्य प्राणी धर्म धारण कर सकता है और अपने आत्मा का कल्याण कर सकता है' इस उदार घोषणा के साथ उन्हें ऊँचे उठ सकने का आश्वासन, बल और साहस दिया। महावीर के संघ में पापी से पापी भी सम्मिलित हो सकते थे और उन्हें धर्म-धारण की अनुज्ञा थी। उनका स्पष्ट उपदेश था कि 'पाप से घृणा करो, पापी से नहीं' और इसीलिए उनके संघ का उस समय जो विशाल रूप था वह तत्कालीन अन्य संघों में कम मिलता था। ज्येष्ठा और अंजनचोर जैसे पापियों का उद्धार महावीर के उदार धर्म ने ही किया था। इन्हीं सब बातों से महान् आचार्य स्वामी समन्तभद्र ने महावीर के शासन (तीर्थ-धर्म) को 'सर्वोदय तीर्थ' सबका उदय करने वाला कहा है। उनके धर्म की यह सबसे बड़ी विशेषता है। महावीर ने अपने उपदेशों में जिन तत्त्वज्ञानपूर्ण सिद्धान्तों का प्रतिपादन एवं प्रकाशन किया उन पर कुछ प्रकाश डालना आवश्यक है - 1. सर्वज्ञ ( परमात्म ) वाद - जहाँ अन्य धर्मों में जीव को सदैव ईश्वर का दास रहना बतलाया गया है वहाँ जैन धर्म का मन्तव्य है कि प्रत्येक योग्य आत्मा अपने अध्यवसाय एवं प्रयत्नों द्वारा स्वतंत्र, पूर्ण एवं ईश्वर - सर्वज्ञ परमात्मा बन सकता है। जैसे एक छह वर्ष का विद्यार्थी 'अ आ इ सीखता हुआ एक-एक दर्जे को पास करके एम. ए. और डॉक्टर बन जाता है और छह वर्ष के अल्प ज्ञान को सहस्रों गुना विकसित कर लेता है, उसी प्रकार साधारण आत्मा भी दोषों और आवरणों को दूर करता हुआ महात्मा तथा परमात्मा बन जाता है। कुछ दोषों और आवरणों को दूर करने से महात्मा और सर्व दोषों तथा आवरणों को दूर करने से परमात्मा कहलाता है। अतएव जैनधर्म में गुणों की अपेक्षा पूर्ण विकसित आत्मा ही परमात्मा है, सर्वज्ञ एवं ईश्वर है - उससे जुदा एकरूप कोई ईश्वर नहीं है। यथार्थतः गुणों की अपेक्षा जैनधर्म में ईश्वर और जीव में कोई भेद नहीं है। यदि भेद है तो वह यही कि जीव कर्म-बन्धन-युक्त है और ईश्वर कर्म-बन्धन-मुक्त है। पर कर्म-बन्धन के दूर हो जाने पर वह भी ईश्वर हो जाता है। इस तरह जैनधर्म में अनन्त ईश्वर हैं। हम व आप भी कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाने पर ईश्वर (सर्वज्ञ) बन सकते हैं। पूजा, उपासनादि जैनधर्म में मुक्त न होने तक ही बतलाई है। उसके बाद वह और ईश्वर सब स्वतन्त्र व समान हैं और अनन्त गुणों के भण्डार हैं। यही सर्वज्ञवाद अथवा परमात्मवाद है जो सबसे निराला है। त्रिपिटिकों (मज्झिमनिकाय अनु. पृ. 57 आदि) में महावीर (निग्गंठनातपुत्त) को बुद्ध और उनके आनन्द आदि शिष्यों ने 'सर्वज्ञ सर्वदर्शी निरन्तर समस्त ज्ञान दर्शनवाला कहकर अनेक जगह उल्लेखित किया है। 2. रत्नत्रय धर्म - जीव परमात्मा कैसे बन सकता है, इस बात को भी जैनधर्म में बतलाया गया है। जो जीव सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय धर्म को धारण करता है वह संसार के दु:खों से मुक्त परमात्मा हो जाता है। (क) सम्यक्दर्शन - मूढ़ता और अभिमान रहित होकर यथार्थ (निर्दोष) देव (परमात्मा), यथार्थ वचन और यथार्थ महात्मा को मानना और उनपर ही अपना विश्वास करना। ( ख ) सम्यक्ज्ञान - न कम, न ज्यादा, यथार्थ, सन्देह और विपर्यय रहित तत्त्व का ज्ञान करना। (ग) सम्यक्चारित्र - हिंसा न करना, झूठ न बोलना, पर-वस्तु को बिना दिये ग्रहण न करना, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना अपरिग्रही होना। गृहस्थ इनका पालन एकदेश और निर्ग्रन्थ साधु पूर्णत: करते हैं। 3. सप्त तत्त्व - जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष - ये सात तत्त्व (वस्तुभूत पदार्थ) हैं। जो चेतना (जानने-देखने के) गुण से युक्त है वह जीवतत्त्व है। जो चेतनायुक्त नहीं है वह अजीवतत्त्व है। इसके पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल - ये पाँच भेद हैं। जिन कारणों से जीव और पुद्गल का संबंध होता है वे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग आस्रवतत्त्व हैं। दूध-पानी की तरह जीव और पुद्गल का जो गाढ सम्बन्ध है वह बन्धतत्त्व है। अनागत बन्ध का न होना संवरतत्त्व है और संचित पूर्व बन्ध का छूट जाना निर्जरा है और सम्पूर्ण कर्मबन्धन से रहित हो जाना मोक्ष है। मुमुक्षु और संसारी दोनों के लिए इन तत्त्वों का ज्ञान करना आवश्यक है। 4. कर्म - जो जीव को पराधीन बनाता है, उसकी स्वतंत्रता में बाधक है। वह कर्म है। इस कर्म की वजह से ही जीवात्मा नाना योनियों में भ्रमण करता है। इसके ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय - ये आठ भेद हैं। इनके भी उत्तर भेद अनेक हैं। 5. अनेकान्त और स्याद्वाद - जैन धर्म को ठीक तरह समझने-समझाने और मीमांसा करने-कराने के लिए महावीर ने जैनधर्म के साथ ही जैन दर्शन का भी प्ररूपण किया। (क) अनेकान्त - नाना धर्मरूप वस्तु अनेकान्त है। (ख) स्याद्वाद - अपेक्षा से नाना धर्मों को कहने वाले वचन प्रकार को स्याद्वाद कहते हैं। अपेक्षावाद, कथंचित्वाद आदि इसी के नाम हैं। इनका और ऐसे ही और अनेक सिद्धान्तों का महावीर ने प्रतिपादन किया था, जो जैन शास्त्रों से ज्ञातव्य हैं। अन्त में 72 वर्ष की आयु में कार्तिक वदी अमावस्या के प्रात: महावीर ने पावा से निर्वाण प्राप्त किया, जिसकी स्मृति में जैन-समाज में वीर-निर्वाण संवत् प्रचलित है और जो आज 2544 चल रहा है।
  14. admin

    Mahavir Jayanti

    भगवान्म हावीर जन्म कल्याणक
  15. ज्ञानोदय तीर्थक्षेत्र के श्वेतवर्णी मूलनायक 1008 श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान की जाप👏🏻👏🏻👏🏻
  16. श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के पावन अवसर पर देश विदेश के अनेकों जैन बन्धु इस बार कर्नाटक की यात्रा करेगे। कर्नाटक में अन्य जैन तीर्थो के दर्शनों हेतु 5 दिनों का एक यात्रा चार्ट संलग्न है, जो बैंगलोर से शुरू हो कर बंगलोर में ही सम्पन्न हो रहा है। आप अपनी सुविधा अनुसार दिन कम या ज्यादा कर सकते है।
  17. स्वात्मस्थित: सर्वगत: समस्त-, व्यापारवेदी विनिवृत्तसङ्ग:। प्रवृद्धकालोप्यजरो वरेण्य:, पायादपायात्पुरुष: पुराण:॥ १॥ परैरचिन्त्यं युगभारमेक:, स्तोतुं वहन्योगिभिरप्यशक्य:। स्तुत्योऽद्य मेऽसौ वृषभो न भानो:, किमप्रवेशे विशति प्रदीप:॥२॥ तत्त्याज शक्र: शकनाभिमानं, नाहं त्यजामि स्तवनानुबन्धम्। स्वल्पेन बोधेन ततोऽधिकार्थं, वातायनेनेव निरूपयामि ॥३॥ त्वं विश्वदृश्वा सकलैरदृश्यो, विद्वानशेषं निखिलैरवेद्य:। वक्तुं कियान्कीदृश इत्यशक्य:, स्तुतिस्ततोऽशक्तिकथा तवास्तु॥ ४॥ व्यापीडितं बालमिवात्मदोषै- रुल्लाघतां लोकमवापिपस्त्वम्। हिताहितान्वेषणमान्द्यभाज: , सर्वस्य जन्तोरसि बालवैद्य:॥५॥ दाता न हर्ता दिवसं विवस्वा- नद्यश्व इत्यच्युतदर्शिताश:। सव्याजमेवं गमयत्यशक्त:, क्षणेन दत्सेऽभिमतं नताय॥ ६॥ उपैति भक्त्या सुमुखः सुखानि, त्वयि स्वभावाद्विमुखश्च दु:खं। सदावदातद्युतिरेकरूप - स्तयोस्त्वमादर्श इवावभासि॥ ७॥ अगाधताब्धे: स यत: पयोधिर् मेरोश्च तुङ्गा प्रकृति: स यत्र। द्यावा पृथिव्यो: पृथुता तथैव, व्याप त्वदीया भुवनान्तराणि॥ ८॥ तवानवस्था परमार्थतत्त्वं, त्वया न गीत: पुनरागमश्च। दृष्टं विहाय त्वमदृष्टमैषीर् विरुद्धवृत्तोऽपि समञ्जसस्त्वम्॥ ९॥ स्मर: सुदग्धो भवतैव तस्मिन्, नुद्धूलितात्मा यदि नाम शम्भु:। अशेत वृन्दोपहतोऽपि विष्णु:, किं गृह्यते येन भवानजाग:॥ १०॥ स नीरजा: स्यादपरोऽघवान्वा, तद्दोषकीत्र्यैव न ते गुणित्वं। स्वतोऽम्बुराशेर्महिमा न देव!, स्तोकापवादेन जलाशयस्य॥११॥ कर्मस्थितिं जन्तुरनेक भूमिं, नयत्यमुं सा च परस्परस्य। त्वं नेतृभावं हि तयोर्भवाब्धौ, जिनेन्द्र! नौनाविकयोरिवाख्य:॥१२॥ सुखाय दु:खानि गुणाय दोषान्, धर्माय पापानि समाचरन्ति। तैलाय बाला: सिकतासमूहं, निपीडयन्ति स्फुटमत्वदीया:॥१३॥ विषापहारं मणिमौषधानि, मन्त्रं समुद्दिश्य रसायनं च। भ्राम्यन्त्यहो न त्वमिति स्मरन्ति, पर्यायनामानि तवैव तानि॥१४॥ चित्ते न किञ्चित्कृतवानसि त्वं देव: कृतश्चेतसि येन सर्वम्। हस्ते कृतं तेन जगद्विचित्रं सुखेन जीवत्यपि चित्तबाह्य:॥१५॥ त्रिकालतत्त्वं त्वमवैस्त्रिलोकी, स्वामीतिसंख्यानियतेरमीषाम् । बोधाधिपत्यं प्रति नाभविष्यं-, स्तेऽन्येऽपि चेद्वयाप्स्यदमूनपीदम्॥१६॥ नाकस्य पत्यु: परिकर्म रम्यं, नागम्यरूपस्य तवोपकारि। तस्यैव हेतु: स्वसुखस्य भानो-, रुद्विभ्रतच्छत्रमिवादरेण॥१७॥ क्वोपेक्षकस्त्वं क्व सुखोपदेश: स चेत्किमिच्छा प्रतिकूलवाद:। क्वासौ क्व वा सर्वजगत्प्रियत्वं तन्नो यथातथ्यमवेविचं ते ॥१८॥ तुङ्गात्फलं यत्तदकिंचनाच्च प्राप्यं समृद्धान्न धनेश्वरादे:। निरम्भ - सोऽप्युच्चतमादिवाद्रेर्, नैकापि निर्याति धुनी पयोधे:॥ १९॥ त्रैलोक्यसेवानियमाय दण्डं दध्रे यदिन्द्रो विनयेन तस्य। तत्प्रातिहार्यं भवत: कुतस्त्यं तत्कर्मयोगाद्यदि वा तवास्तु॥ २०॥ श्रिया परं पश्यति साधु नि:स्व:, श्रीमान्न कश्चित्कृपणं त्वदन्य:। यथा प्रकाशस्थितमन्धकार-, स्थायीक्षतेऽसौ न तथा तम:स्थम्॥ २१॥ स्ववृद्धि - नि:श्वासनिमेषभाजि प्रत्यक्षमात्मानुभवेऽपि मूढ:। किं चाखिलज्ञेयविवर्तिबोध-, स्वरूपमध्यक्षमवैति लोक:॥२२॥ तस्यात्मजस्तस्य पितेति देव!, त्वां येऽवगायन्ति कुलं प्रकाश्य। तेऽद्यापि नन्वाश्मनमित्यवश्यं, पाणौ कृतं हेम पुनस्त्यजन्ति॥ २३॥ दत्तस्त्रिलोक्यां पटहोऽभिभूता:, सुरासुरास्तस्य महान्स लाभ:। मोहस्य मोहस्त्वयि को विरोद्धु- र्मूलस्य नाशो बलवद्विरोध:॥ २४॥ मार्गस्त्वयैको ददृशे विमुक्तेश् , चतुर्गतीनां गहनं परेण। सर्वं मया दृष्टमिति स्मयेन त्वं मा कदाचिद्भुजमालुलोक:॥ २५॥ स्वर्भानुरर्कस्य हविर्भुजोऽम्भ:, कल्पान्तवातोऽम्बुनिधेर्विघात: । संसारभोगस्य वियोगभावो विपक्षपूर्वाभ्युदयास्त्वदन्ये॥२६॥ अजानतस्त्वां नमत: फलं य- त्तज्जानतोऽन्यं न तु देवतेति। हरिन्मणिं काचधिया दधानस्, तं तस्य बुद्ध्या वहतो न रिक्त:॥२७॥ प्रशस्तवाचश्चतुरा: कषायैर्, दग्धस्य देवव्यवहारमाहु:। गतस्य दीपस्य हि नन्दितत्वं, दृष्टं कपालस्य च मङ्गलत्वम्॥ २८॥ नानार्थमेकार्थमदस्त्वदुक्तं , हितं वचस्ते निशमय्य वक्तु:। निर्दोषतां के न विभावयन्ति, ज्वरेण मुक्त: सुगम: स्वरेण॥ २९॥ न क्वापि वाञ्छा ववृते च वाक्ते, काले क्व चित्कोऽपि तथा नियोग:। न पूरयाम्यम्बुधिमित्युदंशु:, स्वयं हि शीतद्युतिरभ्युदेति ॥३०॥ गुणा गभीरा: परमा: प्रसन्ना, बहुप्रकारा बहवस्तवेति। दृष्टोऽयमन्त: स्तवनेन तेषां, गुणो गुणानां किमत: परोऽस्ति॥ ३१॥ स्तुत्या परं नाभिमतं हि भक्त्या स्मृत्या प्रणत्या च ततो भजामि। स्मरामि देवं प्रणमामि नित्यं केनाप्युपायेन फलं हि साध्यम्॥३२॥ ततस्त्रिलोकीनगराधिदेवं , नित्यं परं ज्योतिरनन्तशक्तिम्। अपुण्यपापं परपुण्यहेतुं नमाम्यहं वन्द्यमवन्दितारम्॥३३॥ अशब्दमस्पर्शमरूपगन्धं त्वां नीरसं तद्विषयावबोधम्। सर्वस्य मातारममेयमन्यैर्, जिनेन्द्रमस्मार्यमनुस्मरामि ॥३४॥ अगाधमन्यैर्मनसाप्यलंघ्यं , निष्किञ्चनं प्रार्थितमर्थवद्भि:। विश्वस्य पारं तमदृष्टपारं, पतिं जनानां शरणं व्रजामि॥ ३५॥ त्रैलोक्यदीक्षागुरवे नमस्ते यो वर्धमानोऽपि निजोन्नतोऽभूत्। प्राग्गण्डशैल: पुनरद्रिकल्प: पश्चान्न मेरु: कुलपर्वतोऽभूत्॥ ३६॥ स्वयं प्रकाशस्य दिवा निशा वा, न बाध्यता यस्य न बाधकत्वम्। न लाघवं गौरवमेकरूपं, वन्दे विभुं कालकलामतीतम्॥ ३७॥ इति स्तुतिं देव विधाय दैन्या- द्वरं न याचे त्वमुपेक्षकोऽसि। छाया तरुं संश्रयत: स्वत: स्यात्, कश्छायया याचितयात्मलाभ:॥३८॥ अथास्ति दित्सा यदि वोपरोध- स्त्वय्येव सक्तां दिश भक्तिबुद्धिम्। करिष्यते देव तथा कृपां मे को वात्मपोष्ये सुमुखो न सूरि:॥ ३९॥ वितरति विहिता यथाकथञ्चि- ज्जिन विनताय मनीषितानि भक्ति:। त्वयि नुतिविषया पुनर्विशेषा- द्दिशति सुखानि यशो धनंजयं च॥४०॥
  18. शिवं शुद्धबुद्धं परं विश्वनाथं, न देवो न बंधुर्न कर्मा न कर्ता। न अङ्गं न सङ्गं न स्वेच्छा न कायं, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ १॥ न बन्धो न मोक्षो न रागादिदोष:, न योगं न भोगं न व्याधिर्न शोक:। न कोपं न मानं न माया न लोभं, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ २॥ न हस्तौ न पादौ न घ्राणं न जिह्वा, न चक्षुर्न कर्ण न वक्त्रं न निद्रा। न स्वामी न भृत्यो न देवो न मत्र्य:, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ ३॥ न जन्म न मृत्यु: न मोहं न चिंता, न क्षुद्रो न भीतो न काश्र्यं न तन्द्रा। न स्वेदं न खेदं न वर्णं न मुद्रा, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ ४॥ त्रिदण्डे त्रिखण्डे हरे विश्वनाथं, हृषी-केशविध्वस्त-कर्मादिजालम्। न पुण्यं न पापं न चाक्षादि-गात्रं, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ ५॥ न बालो न वृद्धो न तुच्छो न मूढो, न स्वेदं न भेदं न मूर्तिर्न स्नेह:। न कृष्णं न शुक्लं न मोहं न तंद्रा, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ ६॥ न आद्यं न मध्यं न अन्तं न चान्यत्, न द्रव्यं न क्षेत्रं न कालो न भाव:। न शिष्यो गुरुर्नापि हीनं न दीनं, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ ७॥ इदं ज्ञानरूपं स्वयं तत्त्ववेदी, न पूर्णं न शून्यं न चैत्यस्वरूपम्। न चान्यो न भिन्नं न परमार्थमेकं, चिदानन्दरूपं नमो वीतरागम्॥ ८॥ आत्माराम - गुणाकरं गुणनिधिं, चैतन्यरत्नाकरं, सर्वे भूतगता-गते सुखदुखे, ज्ञाते त्वयि सर्वगे, त्रैलोक्याधिपते स्वयं स्वमनसा, ध्यायन्ति योगीश्वरा:, वंदे तं हरिवंशहर्ष-हृदयं, श्रीमान् हृदाभ्युद्यताम्॥ ९॥
  19. admin

    वज्रापंज्जर

    (सांसारिक विपत्तिओ दूर करी आध्यात्मिक संपत्ति प्रदान करनारी, सप्त भयोनुं निवारण करी अभय बनावनारी, महा अनुष्ठान स्वरुप आत्मरक्षा विविध मुद्राओथी करवा पूर्वक आपणी आजुबाजु वज्रमय किलो बनी रह्यो छे, एवी कल्पना करवी.) ॐ परमेष्ठि नमस्कारं, सारं नवपदात्मकं । आत्मरक्षाकरं वज्र-पञ्जराभं स्मराम्यहम् ।। ॐ नमो अरिहंताणं, शिरस्कं शिरसि स्थितम् । ॐ नमो सव्वसिद्धाणं, मुखे मुखपटं वरम् ।। ॐ नमो आयरियाणं, अङ्गरक्षाऽतिशायिनी । ॐ नमो उवज्झायाणं, आयुधं हस्तयोर्दृढम् ।। ॐ नमो लोए सव्वसाहूणं, मोचके पादयोः शुभे । एसो पञ्च नमुक्कारो, शिला वज्रमयी तले ।। सव्वपावप्पासणो, वप्रो वज्रमयो बहिः । मंगलाणं च सव्वेसिं, खादिराङ्गारखातिका ।। स्वाहान्तं च पदं ज्ञेयं, पढमं हवइ मङ्गलं । वप्रोपरि वज्रमयं, पिधानं देहरक्षणे ।। महाप्रभावा रक्षेयं, क्षुद्रोपद्रवनाशिनी । परमेष्ठिपदोद्भूता, कथिता पूर्वसूरिभिः ।। यश्चैवं कुरुते रक्षां, परमेष्ठिपदैः सदा । तस्य न स्याद् भयं व्याधि राधिश्चापि कदाचन ।।
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