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  1. 🌤 *१५ जनवरी को प्रथम तीर्थंकर मोक्षकल्याणक पर्व*🌤

    जय जिनेन्द्र बंधुओं,

        
           १५ जनवरी, दिन सोमवार, माघ कृष्ण चतुर्दशी की शुभ तिथि को इस अवसर्पणी काल के *प्रथम तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ ऋषभनाथ भगवान* का मोक्ष कल्याणक पर्व आ रहा है-


    🙏🏻
    १५ जनवरी को सभी अपने-२ नजदीकी जिनालयों में सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाकर मोक्षकल्याणक पर्व मनाएँ।

    🙏🏻
    इस पुनीत अवसर धर्म प्रभावना के अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए।

    🙏🏻
    इस पुनीत अवसर मानव सेवा के कार्यक्रमों का भी आयोजन करना चाहिए।


       🙏🏻 *ऋषभनाथ भगवान की जय*🙏🏻


    👏🏻 *श्रमण संस्कृति सेवासंघ, मुम्बई*👏🏻
        *"मातृभाषा अपनाएँ,संस्कृति बचाएँ"*


  2. जय जिनेन्द्र बंधुओं,

             
             पूज्य वर्णीजी की प्रारम्भ से ही ज्ञानार्जन की प्रबल भावना थी तभी तो वह अभावजन्य विषय परिस्थियों में भी आगे आकर ज्ञानार्जन हेतु संलग्न हो पाये। भरी गर्मी में दोपहर में एक मील ज्ञानार्जन हेतु पैदल जाना भी उनकी ज्ञानपिपासा का ही परिचय है।

          बहुत ही सरल ह्रदय थे गणेशप्रसाद। उनके जीवन का सम्पूर्ण वर्णन बहुत ही ह्रदयस्पर्शी हैं।

    🍀 संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी🍀


          *"पं. गोपालदास वरैया के संपर्क में"*

                         *क्रमांक -६३*


                 पं. बलदेवदासजी महराज को मध्यन्होंपरांत ही अध्ययन कराने का अवसर मिलता था। गर्मी के दिन थे पण्डितजी के घर जाने में प्रायः पत्थरों से पटी हुई सड़क मिलती थी।

           मोतीकटरा से पंडितजी का मकान एक मील अधिक दूर था, अतः मैं जूता पहने ही हस्तलिखित पुस्तक लेकर पण्डितजी के घर पर जाता था।

           यद्यपि इसमें अविनय थी और ह्रदय से ऐसा करना नहीं चाहता था, परंतु निरुपाय था। दुपहरी में यदि पत्थरों पर चलूँ तो पैरों को कष्ट हो, न जाऊँ तो अध्ययन से वंछित रहूँ-मैं दुविधा में पड़ गया।

           लाचार अंतरात्मा ने यही उत्तर दिया कि अभी तुम्हारी छात्रावस्था है, अध्ययन की मुख्यता रक्खो। अध्ययन के बाद कदापि ऐसी अविनय नहीं करना......इत्यादि तर्क-वितर्क के बाद मैं पढ़ने के लिए चला जाता था।

          यहाँ पर श्रीमान पंडित नंदराम जी रहते थे जो कि अद्वितीय हकीम थे। हकीमजी जैनधर्म के विद्वान ही न थे, सदाचारी भी थे। भोजनादि की भी उनके घर में पूर्ण शुद्धता थी। आप इतने दयालु थे कि आगरे में रहकर भी नाली आदि में मूत्र क्षेपण नहीं करते थे।

          एक दिन पंडितजी के पास पढ़ने जा रहा था, देवयोग से आप मिल गये। कहने लगे- कहाँ जाते हो? मैंने कहा- 'महराज ! पंडितजी के पास पढ़ने जा रहा हूँ।' 'बगल में क्या है!' मैंने कहा- पाठ्य पुस्तक सर्वार्थसिद्धि है।' आपने मेरा वाक्य श्रवण कर कहा - 'पंचम काल है ऐसा ही होगा, तुमसे धर्मोंनति की क्या आशा हो सकती है और पण्डितजी से क्या कहें? '

          मैंने कहा- 'महराज निरुपाय हूँ।' उन्होंने कहा- 'इससे तो निरुक्षर रहना अच्छा।' मैंने कहा- महराज ! अभी गर्मी का प्रकोप है पश्चात यह अविनय न होगी।'

           उन्होंने एक न सुनी और कहा- 'अज्ञानी को उपदेश देने से क्या लाभ?' मैंने कहा- महराज ! जबकि भगवान पतितपावन हैं और आप उनके सिद्धांतों के अनुगामी हैं तब मुझ जैसे अज्ञानियों का उद्धार कीजिए। हम आपके बालक हैं, अतः आप ही बतलाइये कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या करूँ?'

          उन्होंने कहा- 'बातों के बनाने में तो अज्ञानी नहीं, पर आचार के पालने में अज्ञान बनते हो!'

           ऐसी ही एक गलती और भी हो गई। वह यह कि मथुरा विद्यालय में पढ़ाने के लिए श्रीमान पंडित ठाकुर प्रसाद जी शर्मा उन्हीं दिनों यहाँ पर आये थे, और मोतीकटरा की धर्मशाला में ठहरे थे। आप व्याकरण और वेदांत के आचार्य थे, साथ ही साहित्य और न्याय के प्रखर विद्वान थे। आपके पांडित्य के समक्ष अच्छे-अच्छे विद्वान नतमस्तक हो जाते थे। हमारे श्रीमान स्वर्गीय पंडित बलदेवदास जी ने भी आपसे भाष्यान्त व्याकरण का अभ्यास किया था।

    🌿 *मेरीजीवन गाथा- आत्मकथा*🌿
     🔹आजकी तिथि- श्रावण कृष्ण ४🔹

  3. ? अमृत माँ जिनवाणी से - ३३६  ?


           *उपवास तथा महराज के विचार*


              सन १९५८ के व्रतों में १०८ नेमिसागर महराज के लगभग दस हजार उपवास पूर्ण हुए थे और चौदह सौ बावन गणधर संबंधी उपवास करने की प्रतिज्ञा उन्होंने ली।

           महराज ! लगभग दस हजार उपवास करने रूप अनुपम तपः साधना करने से आपके विशुद्ध ह्रदय में भारत देश का भविष्य कैसा नजर आता है?

           देश अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुष्काल, अंनाभाव आदि के कष्टों का अनुभव कर रहा है।

             महराज नेमिसागर जी ने कहा- "जब भारत पराधीन था, उस समय की अपेक्षा स्वतंत्र भारत में जीववध, मांसाहार आदि तामसिक कार्य बड़े वेग से बढ़ रहे हैं। इनका ही दुष्परिणाम अनेक कष्टों का आविर्भाव तथा उनकी वृद्धि है।"


    ? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का*?
        ?आजकी तिथी - वैशाख कृष्ण १?

  4. आओ करे चरण बंदन
    (१) सम्मेदशिखर  पहाड़ी में कितने तीर्थंकरो के चरण हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (२) गिरनार जी में 5वे पर्वत पर किसके चरण हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (३) कुण्डलपुर में किस केवली के चरण हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (४) चम्पापुर के जल मंदिर में किसके चरण कमल हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (५) चरण किसके प्रतिक हे 
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (६) आनंद कूट पर किसके चरण हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (७) नेमिनाथ भगवान् की टोक पर कितने चरण बने हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (८) पाँच चरण किस टोक पर हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (९) गौतमस्वामी की टोक पर कितने चरण बने हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (१०) ऐसे तीर्थंकर का नाम जिनके कारण दो स्थानों पर हे
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (११) सबसे बड़े दर्शन किस तीर्थंकर के बने
    उत्तर 
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (१२) शिखर से मोक्ष अंतिम तीर्थंकर के चरण किसके हे
    उत्तर -
    ☁☁☁☁☁☁☁☁
    (१३) शिखर जी बंदना कितने किलो मीटर की हे
    उत्तर -
     

  5. पुनः आचार्य योगीन्दु दृढ़तापूर्वक मोक्षमार्ग में प्रीति करने के लिए समझाते हैं कि यहाँ संसार में कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है, प्रत्येक वस्तु नश्वर है, फिर उनसे प्रीति किस लिए ? क्योंकि प्रिय वस्तु का वियोग दुःखदायी है और वियोग अवश्यंभावी है। जाते हुए जीव के साथ जब शरीर ही नहीं जाता तो फिर संसार की कौन सी वस्तु उसके साथ जायेगी। अतःः सांसारिक वस्तुओं से प्रीति के स्थान पर मोक्ष में प्रीति ही हितकारी है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा

    129.   जोइय सयलु वि कारिमउ णिक्कारिमउ कोइ।

           जीविं जंतिं कुडि गय इहु पडिछन्दा जोइ।।

    अर्थ -हे योगी! यहाँ प्रत्येक (वस्तु) कृत्रिम (नाशवान) है, कोई भी (वस्तु) अकृत्रिम (अविनाशी) नहीं है। जाते हुए जीव के साथ शरीर (कभी भी) नहीं गया, इस समानता (उदाहरण) को तू समझ।

    शब्दार्थ - जोइय- हे योगी, सयलु-प्रत्येक, वि-ही, कारिमउ-कृत्रिम, णिक्कारिमउ-अकृत्रिम, -नहीं, कोइ-कोई भी, जीविं-जीव के साथ, जंतिं -जाते हुए, कुडि-शरीर, -नहीं, गय-गया, इहु- इस, पडिछन्दा-समानता को, जोइ-समझ।

     

     

  6. परम पूज्य आचार्य श्री 108 संभव सागर जी महाराज के शिष्य पूज्य उपाध्याय श्री 108 आत्मा सागर जी महाराज का आज दोपहर 3:00 बजे  नयापुरा उज्जैन से बेनडिया को होगा  ।

  7. आचार्य, उपाध्याय और साधुओं के बीच में क्या अन्तर हें 

    Differentiate between Acharya, Upadhyaya and Sadhus.

    • You can answer this question in Hindi or English
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  8. ? सभी को जय जिनेन्द्र?
       एवम् परम पूज्य गुरूदेव आचार्य श्री १०८ विद्या सागर जी महाराज का मंगल
    ✋✋✋आशीर्वाद✋✋✋

    आज का दिन मंगलमय हो ।।

    ?शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये । 

    ?सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है ।

    ? त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं।

    ?रोज़ कुछ त्याग करने से असंख्यात बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय) होती है
     
    ? नरक गति का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह  के नियम जीवन में नहीं ले पाते हैं  

    आज-    11-02-2016
      दिन-     गुरूवार

    ?"" आप चाहे तो सिर्फ आज के लिये ये त्याग/नियम भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने   अनुसार ले सकते है ।।                                                                                                                                                                                                                                   
     ?नियम ➡ आज गुलाब जामुन का त्याग !

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    ?शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की  और निरंतराय आहार की भावना  रखे और हो सके तो दर्शन करके आहार भी दें।
    ??जय जिनेन्द्र ??

    ?जिन मंदिर  जी  जाकर  कुछ गुप्तदान जरुर  करें।?

    आप नीचे कमेंट में त्याग हे या नियम हें ऐसा लिख सकते हें 

    -Singhai Deepak Jain

  9. DasLakshan Parv day 7- Uttam Tap Dharma -- उत्तम तप धर्म (Penance or Austerities) - To practice austerities putting a check on all worldly allurements.

     

    Shloka:

    तप चाहें सुरराय, करम-शिखर को वज्र है ।
    द्वादशविधि सुखदाय, क्यों न करै निज सकति सम ॥
    उत्तम तप सबमाहिं बखाना, करम शैल को वज्र-समाना ।
    बस्यो अनादि-निगोद मन्झारा, भू-विकलत्रय-पशु-तन धारा ।
    धारा मनुज तन महादुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता ।
    श्रीजैनवानी तत्वग्यानी, भई विषय-पयोगता ।।
    अति महादुर्लभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरैं ।
    नर-भव अनूपम कनक घर पर मणिमयी कलसा धरैं ॥


    Meaning:
    Even the king of Devtaas wish to achieve supreme austerity as it is like a Vajraa (a weapon) to break the mountain of the Karma. This supreme Austerity has twelve types. And since this Austerity brings uncomparable happiness to life then why shouldn’t we all practise and achieve this supreme austerity.
    In all the works Tap(Austerity) has been called the best as it acts like a weapon which could demolish even the mountain of Karma.
    In the beginning we were in the Nigoda and faced lot of pains, somehow we got through it and took birth in 2,3,4 sensed body and also among 5 sensed animals. After going thorugh all the pains and suffering in all these bodies by great luck we have got birth in the human body which is extremely rare. We have also got good society and long life as well as good health. Apart from all these we have found the extremely important thing in form of Jinvaani (Holy books) and also the capability to understand them. We also by fortune have the interest to understand the reality.
    If we could leave all the raag, vishay and kashaay and achieve the supreme austerity, it would be like putting a crown of diamond over the golden house !!

     

    Happy Uttam Tap Dharma !!

  10. जैन समाज  की संथारा/सल्लेखना प्रथा पर रोक लगाते राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर  सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए स्टे लगा दिया। यह संभव हुआ आप सभी के प्रयासो से, णमोकार मंत्र के जाप से, और आप सभी के मौन जुलूस मे उपस्तिथि से.
    सभी को धन्यवाद एवं हार्दिक शुभकामनाए.

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    ṆAMO ARIHANTĀṆAM,
    ṆAMO SIDDHĀṆAM,
    ṆAMO ĀVARIVĀṆAM,
    ṆAMO UVAJJHĀYĀṆAM,
    ṆAMO LOE SAVVA SĀHŪṆAM

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    Daughter: Ma, we recite the Ṇamokāra-Mantra daily; what is Namokāra-Mantra? Please tell us.
    Mother:  ṆAMOKĀRA-MANTRA is a prayer of  virtues. We Jainas worship Arihanta, Siddha, Ācārya, Upādhyaya and Sadhu, by reciting Ṇamokāra-Mantra. They are known as " PAÑCA ­PARAMESTHI". Actually Ṇamokāra-Mantra is a reverence ­Mantra.


    Daughter: Ma, what do we gain by reverence to Pañca-Paramesthī?
    Mother:  Jainas worship good qualities of a person and not only the person. So, this reverence (deep respect) is impersonal. It is focused on their virtues (good qualities). Indeed, it is a reverence of their virtues. It is reverence for their virtues. We wish to instill the virtues of the PAÑCA-PARMESTHĪ in our lives. Ṇamokāra-Mantra reminds us to achieve this goal.


    Daughter: Who are Arihantas?
    Mother: Arihantas are supreme human beings. They preach the absolute truth. They know every thing about the universe. At the end of their lives, they become pure-souls (Siddhas).

    Daughter: Who are Siddhas?
    Mother:  Siddhas are pure souls without a physical body. They have freed themselves from all kinds of bondage.


    Daughter:  Ma, why do we pay our reverence first to Arihantas in Ṇamokāra-Mantras?
    Mother:  Although, Siddhas are spiritually higher than Arihantas, we pray Arihantas first because they preach us the path of Bliss.


    Daughter: Who is an Ācārya?
    Mother:  An Ācāryais the leader of the monks (SADHŪS). He himself strictly practices the teachings of the religion and make other monks to follow such practices. He is a propagator of ethico-spiritual values.

    Daughter:  Who is an Upādhyaya?
    Mother:  An Upādhyaya is the reader of holy scriptures. He himself learns and teaches other monks. He is a teacher of ethico­spiritual values.


    Daughter:  Who is a sādhu?
    Mother:   A Sādhu is completely possessionless naked monk. He is indifferent to worldly pleasures and passions. He follows the path of spiritual progress. His daily routine consists of study of scriptures and meditation. He is a pious personality.


    Daughter:  What is the difference amongst Ācāryas, Upādhyayas and Sādhūs?
    Mother:  Ācāryas, Upādhyayas and Sādhūs are all monks. All of them study and practice the teachings of religion. The basic difference amongst them is that the Ācārya is the head monk of the group of monks. A monk who has highest degree of scriptural knowledge is appointed as an Upādhyaya. A Sadhu is a monk who practices the religion under the guidance of Ācārya.


    Dear child, Ṇamokāra Mantra is a unique prayer. Pañca-Parmesthī are the ideals for us to follow. By reciting Ṇamokāra Mantra (9 or 108 times), we gain peace, harmony and purity of thoughts. In Jainism, the Pañca-Parmesthī are represented by the symbol OM (ॐ) or AAAUM. It is an acronym formed from the Sanskrit words Arihanta, Asariri (Siddhas who do not have material bodies), Ācharya, Upādhyaya and Munī (Sādhu).

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